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Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 9

191 Sukta
11 Mantra
1/114/9
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
उप॑ ते॒ स्तोमा॑न्पशु॒पा इ॒वाक॑रं॒ रास्वा॑ पितर्मरुतां सु॒म्नम॒स्मे। भ॒द्रा हि ते॑ सुम॒तिर्मृ॑ळ॒यत्त॒माथा॑ व॒यमव॒ इत्ते॑ वृणीमहे ॥

उप॑ । ते॒ । स्तोमा॑न् । प॒शु॒पाःऽइ॑व । आ । अ॒क॒र॒म् । रास्व॑ । पि॒तः॒ । म॒रु॒ता॒म् । सु॒म्नम् । अ॒स्मे इति॑ । भ॒द्रा । हि । ते॒ । सु॒ऽमतिः । मृ॒ळ॒यत्ऽत॑मा । अथ॑ । व॒यम् । अव॑ । इत् । ते॒ । वृ॒णी॒म॒हे॒ ॥

Mantra without Swara
उप ते स्तोमान्पशुपा इवाकरं रास्वा पितर्मरुतां सुम्नमस्मे। भद्रा हि ते सुमतिर्मृळयत्तमाथा वयमव इत्ते वृणीमहे ॥

उप। ते। स्तोमान्। पशुपाःऽइव। आ। अकरम्। रास्व। पितः। मरुताम्। सुम्नम्। अस्मे इति। भद्रा। हि। ते। सुऽमतिः। मृळयत्ऽतमा। अथ। वयम्। अव। इत्। ते। वृणीमहे ॥ १.११४.९

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मरुताम्) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करानेहारे की (पितः) पालना करते हुए दुष्टों को रुलानेहारे सभापति ! (हि) जिस कारण मैं (पशुपाइव) जैसे पशुओं को पालनेहारा चरवाहा अहीर गौ आदि पशुओं से दूध, दही, घी, मट्ठा आदि ले के पशुओं के स्वामी को देता है, वैसे (स्तोमान्) प्रशंसनीय रत्न आदि पदार्थों को (ते) आपके लिये (उप, आ, अकरम्) आगे करता हूँ, इस कारण आप (अस्मे) मेरे लिये (सुम्नम्) सुख (रास्व) देओ, (अथ) इसके अनन्तर जो (ते) आपकी (मृडयत्तमा) सब प्रकार से सुख करनेवाली (भद्रा) सुखरूप (सुमतिः) श्रेष्ठ मति और जो (ते) आपका (अवः) रक्षा करना है, उस मति और रक्षा करने को (वयम्) हम लोग जैसे (वृणीमहे) स्वीकार करते हैं (इत्) वैसे ही आप भी हम लोगों का स्वीकार करें ॥ ९ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमा और वाचकलुप्तोपमालङ्कार हैं। प्रजापुरुष राजपुरुषों से राजनीति और राजपुरुष प्रजापुरुषों से प्रजाव्यवहार को जान, जानने योग्य को जाने हुए सनातन धर्म का आश्रय करें ॥ ९ ॥
Subject
फिर राजा प्रजाजन परस्पर कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।