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Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 6

191 Sukta
11 Mantra
1/114/6
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इ॒दं पि॒त्रे म॒रुता॑मुच्यते॒ वच॑: स्वा॒दोः स्वादी॑यो रु॒द्राय॒ वर्ध॑नम्। रास्वा॑ च नो अमृत मर्त॒भोज॑नं॒ त्मने॑ तो॒काय॒ तन॑याय मृळ ॥

इ॒दम् । पि॒त्रे । म॒रुता॑म् । उ॒च्य॒ते॒ । वचः॑ । स्वा॒दोः । स्वादी॑यः । रु॒द्राय॑ । वर्ध॑नम् । रास्व॑ । च॒ । नः॒ । अ॒मृ॒त॒ । म॒र्त॒ऽभोज॑नम् । त्मने॑ । तो॒काय । तन॑याय । मृ॒ळ॒ ॥

Mantra without Swara
इदं पित्रे मरुतामुच्यते वच: स्वादोः स्वादीयो रुद्राय वर्धनम्। रास्वा च नो अमृत मर्तभोजनं त्मने तोकाय तनयाय मृळ ॥

इदम्। पित्रे। मरुताम्। उच्यते। वचः। स्वादोः। स्वादीयः। रुद्राय। वर्धनम्। रास्व। च। नः। अमृत। मर्तऽभोजनम्। त्मने। तोकाय। तनयाय। मृळ ॥ १.११४.६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अमृत) मरण दुःख दूर कराने तथा आयु बढ़ानेहारे वैद्यराज वा उपदेशक विद्वान् ! आप (नः) हमारे (त्मने) शरीर (तोकाय) छोटे-छोटे बाल-बच्चे (तनयाय) ज्वान बेटे (च) और सेवक वैतनिक वा आयुधिक भृत्य अर्थात् नौकर-चाकरों के लिये (स्वादोः) स्वादिष्ठ से (स्वादीयः) स्वादिष्ठ अर्थात् सब प्रकार स्वादवाला जो खाने में बहुत अच्छा लगे उस (मर्त्यभोजनम्) मनुष्यों के भोजन करने के पदार्थ को (रास्व) देओ, जो (इदम्) यह (मरुताम्) ऋतु-ऋतु में यज्ञ करनेहारे विद्वानों को (वर्द्धनम्) बढ़ानेवाला (वचः) वचन (पित्रे) पालना करने (रुद्राय) और दुष्टों को रुलानेहारे सभाध्यक्ष के लिये (उच्यते) कहा जाता है, उससे हम लोगों को (मृड) सुखी कीजिये ॥ ६ ॥
Essence
वैद्य और उपदेश करनेवाले को यह योग्य है कि आप नीरोग और सत्याचारी होकर सब मनुष्यों के लिये औषध देने और उपदेश करने से उपकार कर सबकी निरन्तर रक्षा करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर वैद्य और उपदेश करनेवाले कैसे अपना वर्त्ताव वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।