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Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 3

191 Sukta
11 Mantra
1/114/3
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अ॒श्याम॑ ते सुम॒तिं दे॑वय॒ज्यया॑ क्ष॒यद्वी॑रस्य॒ तव॑ रुद्र मीढ्वः। सु॒म्ना॒यन्निद्विशो॑ अ॒स्माक॒मा च॒रारि॑ष्टवीरा जुहवाम ते ह॒विः ॥

अ॒श्याम॑ । ते॒ । सु॒ऽम॒तिम् । दे॒व॒ऽय॒ज्यया॑ । क्ष॒यत्ऽवी॑रस्य । तव॑ । रु॒द्र॒ । मी॒ढ्वः॒ । सु॒म्न॒ऽयन् । इत् । विशः॑ । अ॒स्माक॑म् । आ । च॒र॒ । अरि॑ष्टऽवीराः । जु॒ह॒वा॒म॒ । ते॒ । ह॒विः ॥

Mantra without Swara
अश्याम ते सुमतिं देवयज्यया क्षयद्वीरस्य तव रुद्र मीढ्वः। सुम्नायन्निद्विशो अस्माकमा चरारिष्टवीरा जुहवाम ते हविः ॥

अश्याम। ते। सुऽमतिम्। देवऽयज्यया। क्षयत्ऽवीरस्य। तव। रुद्र। मीढ्वः। सुम्नऽयन्। इत्। विशः। अस्माकम्। आ। चर। अरिष्टऽवीराः। जुहवाम। ते। हविः ॥ १.११४.३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 5 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (मीढ्वः) प्रजा को सुख से सींचने और (रुद्र) सत्योपदेश करनेवाले सभाध्यक्ष राजन् ! हम लोग (देवयज्यया) विद्वानों की सङ्गति और सत्कार से (क्षयद्वीरस्य) वीरों का निवास करानेहारे (तव) तेरी (सुमतिम्) श्रेष्ठ प्रज्ञा को (अश्याम) प्राप्त होवें, जो (सुम्नयन्) सुख कराता हुआ तू (अस्माकम्) हमारी (अरिष्टवीराः) हिंसारहित वीरोंवाली (विशः) प्रजाओं को (आ, चर) सब ओर से प्राप्त हो, उस (ते) तेरी प्रजाओं को हम लोग (इत्) भी प्राप्त हों और (ते) तेरे लिये (हविः) देने योग्य पदार्थ को (जुहवाम) दिया करें ॥ ३ ॥
Essence
राजा को योग्य है कि प्रजाओं को निरन्तर प्रसन्न रक्खे और प्रजाओं को उचित है कि राजा को आनन्दित करें। जो राजा प्रजा से कर लेकर पालन न करे तो वह राजा डाकुओं के समान जानना चाहिये। जो पालन की हुई प्रजा राजभक्त न हों वे भी चोर के तुल्य जाननी चाहिये, इसलिये प्रजा राजा को कर देती है कि जिससे यह हमारा पालन करे और राजा इसलिये पालन करता है कि जिससे प्रजा मुझको कर देवें ॥ ३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।