Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 2

191 Sukta
11 Mantra
1/114/2
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
मृ॒ळा नो॑ रुद्रो॒त नो॒ मय॑स्कृधि क्ष॒यद्वी॑राय॒ नम॑सा विधेम ते। यच्छं च॒ योश्च॒ मनु॑राये॒जे पि॒ता तद॑श्याम॒ तव॑ रुद्र॒ प्रणी॑तिषु ॥

मृ॒ळ । नः॒ । रु॒द्र॒ । उ॒त । नः॒ । मयः॑ । कृ॒धि॒ । क्ष॒यत्ऽवी॑राय । नम॑सा । वि॒धे॒म॒ । ते॒ । यत् । शम् । च॒ । योः । च॒ । मनुः॑ । आ॒ऽये॒जे । पि॒ता । तत् । अ॒श्या॒म॒ । तव॑ । रु॒द्र॒ । प्रऽनी॑तिषु ॥

Mantra without Swara
मृळा नो रुद्रोत नो मयस्कृधि क्षयद्वीराय नमसा विधेम ते। यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तव रुद्र प्रणीतिषु ॥

मृळ। नः। रुद्र। उत। नः। मयः। कृधि। क्षयत्ऽवीराय। नमसा। विधेम। ते। यत्। शम्। च। योः। च। मनुः। आऽयेजे। पिता। तत्। अश्याम। तव। रुद्र। प्रऽनीतिषु ॥ १.११४.२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 5 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (रुद्र) दुष्ट शत्रुओं को रुलानेहारे राजन् ! जो हम (क्षयद्वीराय) विनाश किये शत्रु सेनास्थ वीर जिसने उस (ते) आपके लिये (नमसा) अन्न वा सत्कार से (विधेम) विधान करें अर्थात् सेवा करें, उन (नः) हम लोगों को तुम (मृड) सुखी करो और (नः) हम लोगों के लिये (मयः) सुख (कृधि) कीजिये। हे (रुद्र) न्यायाधीश ! (मनुः) मननशील (पिता) पिता के समान आप (यत्) जो रोगों का (शम्) निवारण (च) ज्ञान (योः) दुःखों का अलग करना (च) और गुणों की प्राप्ति का (आयेजे) सब प्रकार सङ्ग कराते हो (तत्) उसको (अश्याम) प्राप्त होवें (उत) वे ही हम लोग (तव) तुम्हारी (प्रणीतिषु) उत्तम नीतियों में प्रवृत्त होकर निरन्तर सुखी होवें ॥ २ ॥
Essence
राजपुरुषों को योग्य है कि स्वयं सुखी होकर सब प्रजाओं को सुखी करें। इस काम में आलस्य कभी न करें और प्रजाजन राजनीति के नियम में वर्त्त के राजपुरुषों को सदा प्रसन्न रक्खें ॥ २ ॥
Subject
अब राजविषय कहा जाता है ।