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Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 11

191 Sukta
11 Mantra
1/114/11
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अवो॑चाम॒ नमो॑ अस्मा अव॒स्यव॑: शृ॒णोतु॑ नो॒ हवं॑ रु॒द्रो म॒रुत्वा॑न्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥

अवो॑चाम । नमः॑ । अ॒स्मै॒ । अ॒व॒स्यवः॑ । शृ॒णोतु॑ । नः॒ । हव॑म् । रु॒द्रः । म॒रुत्वा॑न् । तत् । नः॒ । मि॒त्रः । वरु॑णः । म॒म॒ह॒न्ता॒म् । अदि॑तिः । सिन्धुः॑ । पृ॒थि॒वी । उ॒त । द्यौः ॥

Mantra without Swara
अवोचाम नमो अस्मा अवस्यव: शृणोतु नो हवं रुद्रो मरुत्वान्। तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौः ॥

अवोचाम। नमः। अस्मै। अवस्यवः। शृणोतु। नः। हवम्। रुद्रः। मरुत्वान्। तत्। नः। मित्रः। वरुणः। ममहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः ॥ १.११४.११

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 6

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(अवस्यवः) अपनी रक्षा चाहते हुए हम लोग (अस्मै) इस मान करने योग्य सभाध्यक्ष के लिये (नमः) “नमस्ते” ऐसे वाक्य को (अवोचाम) कहें और वह (मरुत्वान्) बलवान् (रुद्रः) विद्या पढ़ा हुआ सभापति (तत्) उस (नः) हमारे (हवम्) बुलानेरूप प्रशंसावाक्य को (शृणोतु) सुने। हे मनुष्यो ! जो (नः) हमारे “नमस्ते” शब्द को (मित्रः) प्राण (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथ्वी (उत) और (द्यौः) प्रकाश बढ़ाते हैं अर्थात् उक्त पदार्थों को जाननेहारे सभापति को बार-बार “नमस्ते” शब्द कहा जाता है, उसको आप (मामहन्ताम्) बार-बार प्रशंसायुक्त करें ॥ ११ ॥
Essence
प्रजापुरुषों को राजा लोगों के प्रिय आचरण नित्य करने चाहिये और राजा लोगों को प्रजाजनों के कहे वाक्य सुनने योग्य हैं। ऐसे सब राजा-प्रजा मिलकर न्याय की उन्नति और अन्याय को दूर करें ॥ ११ ॥इस सूक्त में ब्रह्मचारी, विद्वान्, सभाध्यक्ष और सभासद् आदि गुणों का वर्णन होने से इस सूक्त में कहे अर्थ की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ एकता जानने योग्य है ॥यह ११४ एकसौ चौदहवाँ सूक्त और ६ छठा वर्ग समाप्त हुआ ॥ ११ ॥
Subject
फिर अध्यापक और उपदेशकों के व्यवहारों को अगले मन्त्र में कहा है ।