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Rigveda Mandal 1 / Sukta 114 / Mantra 10

191 Sukta
11 Mantra
1/114/10
Devata- रुद्रः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ॒रे ते॑ गो॒घ्नमु॒त पू॑रुष॒घ्नं क्षय॑द्वीर सु॒म्नम॒स्मे ते॑ अस्तु। मृ॒ळा च॑ नो॒ अधि॑ च ब्रूहि दे॒वाधा॑ च न॒: शर्म॑ यच्छ द्वि॒बर्हा॑: ॥

आ॒रे । ते॒ । गो॒ऽघ्नम् । उ॒त । पु॒रु॒ष॒ऽघ्नम् । क्षय॑त्ऽवीर । सु॒म्नम् । अ॒स्मे इति॑ । ते॒ । अ॒स्तु॒ । मृ॒ळ । च॒ । नः॒ । अधि॑ । च॒ । ब्रू॒हि॒ । दे॒व॒ । अध॑ । च॒ । नः॒ । शर्म॑ । य॒च्छ॒ । द्वि॒ऽबर्हाः॑ ॥

Mantra without Swara
आरे ते गोघ्नमुत पूरुषघ्नं क्षयद्वीर सुम्नमस्मे ते अस्तु। मृळा च नो अधि च ब्रूहि देवाधा च न: शर्म यच्छ द्विबर्हा: ॥

आरे। ते। गोऽघ्नम्। उत। पुरुषऽघ्नम्। क्षयत्ऽवीर। सुम्नम्। अस्मे इति। ते। अस्तु। मृळ। च। नः। अधि। च। ब्रूहि। देव। अध। च। नः। शर्म। यच्छ। द्विऽबर्हाः ॥ १.११४.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 6 Mantra » 5

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Meaning
हे (क्षयद्वीर) शूरवीर जनों का निवास कराने और (देव) दिव्य अच्छे-अच्छे कर्म करनेहारे विद्वान् सभापति ! (पुरुषघ्नम्) पुरुषों को मारने (च) और (गोघ्नम्) गौ आदि उपकार करनेहारे पशुओं के विनाश करनेवाले प्राणी को निवार करके (ते) आपके (च) और (अस्मे) हम लोगों के लिये (सुम्नम्) सुख (अस्तु) हो, (अधा) इसके अनन्तर (नः) हम लोगों को (मृड) सुखी कीजिये (च) और मैं आपको सुख देऊँ, आप हम लोगों को (अधिब्रूहि) अधिक उपदेशक देओ (च) और मैं आपको अधिक उपदेश करूँ (द्विबर्हाः) व्यवहार और परमार्थ के बढ़ानेवाले आप (नः) हम लोगों के लिये (शर्म्म) घर का सुख (यच्छ) दीजिये (च) और आपके लिये मैं सुख देऊँ। सब हम लोग धर्मात्माओं के (आरे) निकट और दुराचारियों से दूर रहें ॥ १० ॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि यत्न के साथ पशु और मनुष्यों के विनाश करनेहारे दुराचारियों से दूर रहें और अपने से उनका दूर निवास करावें। राजा और प्रजाजनों को परस्पर एक दूसरे से उपदेश कर सभा बना और सबकी रक्षा कर व्यवहार और परमार्थ का सुख सिद्ध करना चाहिये ॥ १० ॥
Subject
फिर राजा-प्रजा के धर्म का उपदेश अगले मन्त्र में किया है ।

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