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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 8

191 Sukta
20 Mantra
1/113/8
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प॒रा॒य॒ती॒नामन्वे॑ति॒ पाथ॑ आयती॒नां प्र॑थ॒मा शश्व॑तीनाम्। व्यु॒च्छन्ती॑ जी॒वमु॑दी॒रय॑न्त्यु॒षा मृ॒तं कं च॒न बो॒धय॑न्ती ॥

प॒रा॒य॒ती॒नाम् । अनु॑ । ए॒ति॒ । पाथः॑ । आ॒ऽय॒ती॒नाम् । प्र॒थ॒मा । शश्व॑तीनाम् । वि॒ऽउ॒च्छन्ती॑ । जी॒वम् । उ॒त्ऽई॒रय॑न्ती । उ॒षाः । मृ॒तम् । कम् । च॒न । बो॒धय॑न्ती ॥

Mantra without Swara
परायतीनामन्वेति पाथ आयतीनां प्रथमा शश्वतीनाम्। व्युच्छन्ती जीवमुदीरयन्त्युषा मृतं कं चन बोधयन्ती ॥

परायतीनाम्। अनु। एति। पाथः। आऽयतीनाम्। प्रथमा। शश्वतीनाम्। विऽउच्छन्ती। जीवम्। उत्ऽईरयन्ती। उषाः। मृतम्। कम्। चन। बोधयन्ती ॥ १.११३.८

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 3

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Meaning
हे उत्तम सौभाग्य बढ़ानेहारी स्त्री ! जैसे यह (उषाः) प्रभात वेला (शश्वतीनाम्) प्रवाहरूप से अनादिस्वरूप (परायतीनाम्) पूर्व व्यतीत हुई प्रभात वेलाओं के पीछे (आयतीनाम्) आनेवाली वेलाओं में (प्रथमा) पहिली (व्युच्छन्ती) अन्धकार का विनाश करती और (जीवम्) जीव को (उदीरयन्ती) कामों में प्रवृत्त कराती हुई (कम्) किसी (चन) (मृतम्) मृतक के समान सोए हुए जन को (बोधयन्ती) जगाती हुई (पाथः) आकाश मार्ग को (अन्वेति) अनुकूलता से जाती-आती है, वैसे ही तू पतिव्रता हो ॥ ८ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कर है। सौभाग्य की इच्छा करनेवाली स्त्रीजन उषा के तुल्य भूत, भविष्यत्, वर्त्तमान समयों में हुई उत्तम शील पतिव्रता स्त्रियों के सनातन वेदोक्त धर्म का आश्रय कर अपने-अपने पति को सुखी करती और उत्तम शोभावाली होती हुई सन्तानों को उत्पन्न कर और सब ओर से पालन करके उन्हें सत्य विद्या और उत्तम शिक्षाओं का बोध कराती हुई सदा आनन्द को प्राप्त करावें ॥ ८ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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