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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 6

191 Sukta
20 Mantra
1/113/6
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्ष॒त्राय॑ त्वं॒ श्रव॑से त्वं मही॒या इ॒ष्टये॑ त्व॒मर्थ॑मिव त्वमि॒त्यै। विस॑दृशा जीवि॒ताभि॑प्र॒चक्ष॑ उ॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

क्ष॒त्राय॑ । त्व॒म् । श्रव॑से । त्व॒म् । म॒ही॒यै । इ॒ष्टये॑ । त्व॒म् । अर्थ॑म्ऽइव । त्व॒म् । इ॒त्यै । विऽस॑दृशा । जी॒वि॒ता । अ॒भि॒ऽप्र॒चक्षे॑ । उ॒षाः । अ॒जी॒गः॒ । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
क्षत्राय त्वं श्रवसे त्वं महीया इष्टये त्वमर्थमिव त्वमित्यै। विसदृशा जीविताभिप्रचक्ष उषा अजीगर्भुवनानि विश्वा ॥

क्षत्राय। त्वम्। श्रवसे। त्वम्। महीयै। इष्टये। त्वम्। अर्थम्ऽइव। त्वम्। इत्यै। विऽसदृशा। जीविता। अभिऽप्रचक्षे। उषाः। अजीगः। भुवनानि। विश्वा ॥ १.११३.६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 2 Mantra » 1

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् सभाध्यक्ष राजन् ! जैसे (उषाः) प्रातर्वेला अपने प्रकाश से (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को (अजीगः) ढाँक लेती है (त्वम्) तू (अभिप्रचक्षे) अच्छे प्रकार शास्त्र-बोध से सिद्ध वाणी आदि व्यवहाररूप (क्षत्राय) राज्य के लिये और (त्वम्) तू (श्रवसे) श्रवण और अन्न के लिये (त्वम्) तू (इष्टये) इष्ट सुख और (महीयै) सत्कार के लिये और (त्वम्) तू (इत्यै) सङ्गति प्राप्ति के लिये (विसदृशा) विविध धर्मयुक्त व्यवहारों के अनुकूल (अर्थमिव) द्रव्यों के समान (जीविता) जीवनादि को सदा सिद्ध किया कर ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे विद्या विनय से प्रकाशमान सत्पुरुष सब समीपस्थ पदार्थों को व्याप्त होकर उनके गुणों के प्रकाश से समस्त अर्थों को सिद्ध करनेवाले होते हैं, वैसे राजादि पुरुष विद्या न्याय और धर्मादि को सब ओर से व्याप्त होकर चक्रवर्त्ती राज्य की यथावत् रक्षा से सब आनन्द को सिद्ध करें ॥ ६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।