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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 5

191 Sukta
20 Mantra
1/113/5
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- स्वराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
जि॒ह्म॒श्ये॒३॒॑चरि॑तवे म॒घोन्या॑भो॒गय॑ इ॒ष्टये॑ रा॒य उ॑ त्वम्। द॒भ्रं पश्य॑द्भ्य उर्वि॒या वि॒चक्ष॑ उ॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

जि॒ह्म॒ऽश्ये॑ । चरि॑तवे । म॒घोनी॑ । आ॒ऽभो॒गये॑ । इ॒ष्टये॑ । रा॒ये । ऊँ॒ इति॑ । त्वम् । द॒भ्रम् । पश्य॑त्ऽभ्यः । उ॒र्वि॒या । वि॒ऽचक्षे॑ । उ॒षाः । अ॒जी॒गः॒ । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
जिह्मश्ये३चरितवे मघोन्याभोगय इष्टये राय उ त्वम्। दभ्रं पश्यद्भ्य उर्विया विचक्ष उषा अजीगर्भुवनानि विश्वा ॥

जिह्मऽश्ये। चरितवे। मघोनी। आऽभोगये। इष्टये। राये। ऊँ इति। त्वम्। दभ्रम्। पश्यत्ऽभ्यः। उर्विया। विऽचक्षे। उषाः। अजीगः। भुवनानि। विश्वा ॥ १.११३.५

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् ! (त्वम्) तू जो (उर्विया) अनेक रूपयुक्त (मघोनी) अधिक धन प्राप्त करानेहारी (उषाः) प्रातर्वेला (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को (अजीगः) निगलती (जिह्मश्ये) वा जो टेढ़े सोने अर्थात् सोने में टेढ़ापन को प्राप्त हुए जन (के) लिये वा (चरितवे) विचरने को (विचक्षे) विविध प्रकटता के लिये (आभोगये) सब ओर से सुख के भोग जिसमें हों उस पुरुषार्थ से युक्त क्रिया के लिये (इष्टये) वा जिसमें मिलते हैं उस यज्ञ के लिये वा (राये) धनों के लिये वा (पश्यद्भ्यः) देखते हुए मनुष्यों के लिये (दभ्रम्) छोटे से (उ) भी वस्तु को प्रकाश करती है, उस उषा को जान ॥ ५ ॥
Essence
जो मनुष्य रात्री के चौथे प्रहर में जागकर शयन पर्य्यन्त व्यर्थ समय को नहीं जाने देते, वे ही सुखी होते हैं, अन्य नहीं ॥ ५ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।