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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 4

191 Sukta
20 Mantra
1/113/4
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
भास्व॑ती ने॒त्री सू॒नृता॑ना॒मचे॑ति चि॒त्रा वि दुरो॑ न आवः। प्रार्प्या॒ जग॒द्व्यु॑ नो रा॒यो अ॑ख्यदु॒षा अ॑जीग॒र्भुव॑नानि॒ विश्वा॑ ॥

भास्व॑ती । ने॒त्री । सू॒नृता॑नाम् । अचे॑ति । चि॒त्रा । वि । दुरः॑ । नः॒ । आ॒व॒रित्या॑वः । प्र॒ऽर्प्य॑ । जग॑त् । वि । ऊँ॒ इति॑ । नः॒ । रा॒यः । अ॒ख्य॒त् । उ॒षाः । अ॒जी॒गः॒ । भुव॑नानि । विश्वा॑ ॥

Mantra without Swara
भास्वती नेत्री सूनृतानामचेति चित्रा वि दुरो न आवः। प्रार्प्या जगद्व्यु नो रायो अख्यदुषा अजीगर्भुवनानि विश्वा ॥

भास्वती। नेत्री। सूनृतानाम्। अचेति। चित्रा। वि। दुरः। नः। आवरित्यावः। प्रऽर्प्य। जगत्। वि। ऊँ इति। नः। रायः। अख्यत्। उषाः। अजीगः। भुवनानि। विश्वा ॥ १.११३.४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 1 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वन् मनुष्यो ! तुम लोगों को जो (भास्वती) अतीवोत्तम प्रकाशवाले (सूनृतानाम्) वाणी और जागृत के व्यवहारों को (नेत्री) प्राप्त करने और (चित्रा) अद्भुत गुण, कर्म, स्वभाववाली (उषाः) प्रभात वेला (नः) हमारे लिये (दुरः) द्वारों (वि, आवः) को प्रकट करती हुई सी वा जो (नः) हमारे लिये (जगत्) संसार को (प्रार्प्य) अच्छे प्रकार अर्पण करके (रायः) धनों को (वि, अख्यत्) प्रसिद्ध करती है (उ) और (विश्वा) सब (भुवनानि) लोकों को (अजीगः) अपनी व्याप्ति से निगलती सी है, वह (अचेति) अवश्य जाननी है ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो उषा सब जगत् को प्रकाशित करके, सब प्राणियों को जगा, सब संसार में व्याप्त होकर, सब पदार्थों को वृष्टि द्वारा समर्थ करके, पुरुषार्थ में प्रवृत्त करा, धनादि की प्राप्ति करा, माता के समान सब प्राणियों को पालती है, इससे आलस्य में उत्तम प्रातःसमय की वेला व्यर्थ न गमाना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर उषा का विषय अगले मन्त्र में कहा है ।