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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 17

191 Sukta
20 Mantra
1/113/17
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
स्यूम॑ना वा॒च उदि॑यर्ति॒ वह्नि॒: स्तवा॑नो रे॒भ उ॒षसो॑ विभा॒तीः। अ॒द्या तदु॑च्छ गृण॒ते म॑घोन्य॒स्मे आयु॒र्नि दि॑दीहि प्र॒जाव॑त् ॥

स्यूम॑ना । वा॒चः । उत् । इ॒य॒र्ति॒ । वह्निः॑ । स्तवा॑नः । रे॒भः । उ॒षसः॑ । वि॒ऽभा॒तीः । अ॒द्य । तत् । उ॒च्छ॒ । गृ॒ण॒ते । म॒घो॒नि॒ । अ॒स्मे इति॑ । आयुः॑ । नि । दि॒दी॒हि॒ । प्र॒जाऽव॑त् ॥

Mantra without Swara
स्यूमना वाच उदियर्ति वह्नि: स्तवानो रेभ उषसो विभातीः। अद्या तदुच्छ गृणते मघोन्यस्मे आयुर्नि दिदीहि प्रजावत् ॥

स्यूमना। वाचः। उत्। इयर्ति। वह्निः। स्तवानः। रेभः। उषसः। विऽभातीः। अद्य। तत्। उच्छ। गृणते। मघोनि। अस्मे इति। आयुः। नि। दिदीहि। प्रजाऽवत् ॥ १.११३.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (मघोनि) प्रशंसित धनयुक्त स्त्री ! तू (अस्मे) हमारे और (गृणते) प्रशंसा करते हुए (पत्ये) पति के अर्थ जो (प्रजावत्) बहुत प्रजायुक्त (आयुः) जीव का हेतु अन्न है (तत्) वह (अद्य) आज (नि, दिदीहि) निरन्तर प्रकाशित कर। जो तेरा (रेभः) बहुश्रुत (स्तवानः) गुण प्रशंसाकर्त्ता (वह्निः) अग्नि के समान निर्वाह करनेहारा पति तेरे लिये (विभातीः) प्रकाशवती (उषसः) प्रभात वेलाओं को जैसे सूर्य वैसे (स्यूमना) सकल विद्याओं से युक्त प्रिय (वाचः) वेदवाणियों को (उत्, इयर्त्ति) उत्तमता से जानता हैं, उसको तू (उच्छ) अच्छा निवास कराया कर ॥ १७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जब स्त्री-पुरुष सुहृद्भाव से परस्पर विद्या और अच्छी शिक्षाओं को ग्रहण कर उत्तम अन्न, धनादि वस्तुओं का संचय करके सूर्य के समान धर्म न्याय का प्रकाश कर सुख में निवास करते हैं, तभी गृहाश्रम के पूर्ण सुख को प्राप्त होते हैं ॥ १७ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।