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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 16

191 Sukta
20 Mantra
1/113/16
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उदी॑र्ध्वं जी॒वो असु॑र्न॒ आगा॒दप॒ प्रागा॒त्तम॒ आ ज्योति॑रेति। आरै॒क्पन्थां॒ यात॑वे॒ सूर्या॒याग॑न्म॒ यत्र॑ प्रति॒रन्त॒ आयु॑: ॥

उत् । ई॒र्ध्व॒म् । जी॒वः । असुः॑ । नः॒ । आ । अ॒गा॒त् । अप॑ । प्र । अ॒गा॒त् । तमः॑ । आ । ज्योतिः॑ । ए॒ति॒ । अरै॑क् । पन्था॑म् । यात॑वे । सूर्या॑य । अग॑न्म । यत्र॑ । प्र॒ऽति॒रन्ते॑ । आयुः॑ ॥

Mantra without Swara
उदीर्ध्वं जीवो असुर्न आगादप प्रागात्तम आ ज्योतिरेति। आरैक्पन्थां यातवे सूर्यायागन्म यत्र प्रतिरन्त आयु: ॥

उत्। ईर्ध्वम्। जीवः। असुः। नः। आ। अगात्। अप। प्र। अगात्। तमः। आ। ज्योतिः। एति। अरैक्। पन्थाम्। यातवे। सूर्याय। अगन्म। यत्र। प्रऽतिरन्ते। आयुः ॥ १.११३.१६

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 4 Mantra » 1

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Meaning
हे मनुष्यो ! जिस उषा की उत्तेजना से (नः) हम लोगों का (जीवः) जीवन का धर्त्ता इच्छादि गुणयुक्त (असुः) प्राण (आ, अगात्) सब ओर से प्राप्त होता, (ज्योतिः) प्रकाश (प्र, अगात्) प्राप्त होता, (तमः) रात्रि (अप, एति) दूर हो जाती और (यातवे) जाने-आने को (पन्थाम्) मार्ग (अरैक्) अलग प्रकट होता, जिससे हम लोग (सूर्य्याय) सूर्य को (आ, अगन्) अच्छे प्रकार होते तथा (यत्र) जिसमें प्राणी (आयुः) जीवन को (प्रतिरन्ते) प्राप्त होकर आनन्द से बिताते हैं, उसको जानकर (उदीर्ध्वम्) पुरुषार्थ करने में चेष्टा किया करो ॥ १६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे यह प्रातःकाल की उषा सब प्राणियों को जगाती, अन्धकार को निवृत्त करती है। और जैसे सांयकाल की उषा सबको कार्य्यों से निवृत्त करके सुलाती है अर्थात् माता के समान सब जीवों को अच्छे प्रकार पालन कर व्यवहार में नियुक्त कर देती है, वैसे ही सज्जन विदुषी स्त्री होती है ॥ १६ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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