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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 14

191 Sukta
20 Mantra
1/113/14
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
व्य१॒॑ञ्जिभि॑र्दि॒व आता॑स्वद्यौ॒दप॑ कृ॒ष्णां नि॒र्णिजं॑ दे॒व्या॑वः। प्र॒बो॒धय॑न्त्यरु॒णेभि॒रश्वै॒रोषा या॑ति सु॒युजा॒ रथे॑न ॥

वि । अ॒ञ्जिऽभिः॑ । दि॒वः । आता॑सु । अ॒द्यौ॒त् । अप॑ । कृ॒ष्णाम् । निः॒ऽनिज॑म् । दे॒वी । आ॒व॒रित्या॑वः । प्र॒ऽबो॒धय॑न्ती । अ॒रु॒णेभिः॑ । अश्वैः॑ । आ । उ॒षाः । या॒ति॒ । सु॒ऽयुजा॑ । रथे॑न ॥

Mantra without Swara
व्य१ञ्जिभिर्दिव आतास्वद्यौदप कृष्णां निर्णिजं देव्यावः। प्रबोधयन्त्यरुणेभिरश्वैरोषा याति सुयुजा रथेन ॥

वि। अञ्जिऽभिः। दिवः। आतासु। अद्यौत्। अप। कृष्णाम्। निःऽनिजम्। देवी। आवरित्यावः। प्रऽबोधयन्ती। अरुणेभिः। अश्वैः। आ। उषाः। याति। सुऽयुजा। रथेन ॥ १.११३.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 4

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Meaning
हे स्त्रीजनो ! तुम जैसे (प्रबोधयन्ती) सोतों को जगाती हुई (देवी) दिव्यगुणयुक्त (उषाः) प्रातःसमय की वेला (अञ्जिभिः) प्रकट करनेहारे गुणों के साथ (दिवः) आकाश से (आतासु) सर्वत्र व्याप्त दिशाओं में सब पदार्थों को (व्यद्यौत्) विशेष कर प्रकाशित करती (निर्णिजम्) वा निश्चितरूप (कृष्णाम्) कृष्णवर्ण रात्रि को (अपावः) दूर करती वा (अरुणेभिः) रक्तादि गुणयुक्त (अश्वैः) व्यापनशील किरणों के साथ वर्त्तमान (सुयुजा) अच्छे युक्त (रथेन) रमणीय स्वरूप से (आ, याति) आती है, उसके समान तुम लोग वर्त्ता करो ॥ १४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रातःसमय की वेला दिशाओं में व्याप्त है, वैसे कन्या लोग विद्याओं में व्याप्त होवें, वा जैसे यह उषा अपनी कान्तियों से शोभायमान होकर रमणीय स्वरूप से प्रकाशमान रहती है, वैसे यह कन्याजन अपने शील आदि गुण और सुन्दर रूप से प्रकाशमान हों, जैसे यह उषा अन्धकार के निवारणरूप प्रकाश को उत्पन्न करती है, वैसे ये कन्याजन मूर्खता आदि का निवारण कर सुसभ्यतादि शुभ गुणों से सदा प्रकाशित रहें ॥ १४ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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