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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 13

191 Sukta
20 Mantra
1/113/13
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
शश्व॑त्पु॒रोषा व्यु॑वास दे॒व्यथो॑ अ॒द्येदं व्या॑वो म॒घोनी॑। अथो॒ व्यु॑च्छा॒दुत्त॑राँ॒ अनु॒ द्यून॒जरा॒मृता॑ चरति स्व॒धाभि॑: ॥

शश्व॑त् । पु॒रा । उ॒षाः । वि । उ॒वा॒स॒ । दे॒वी । अथो॒ इति॑ । अ॒द्य । इ॒दम् । वि । आ॒वः॒ । म॒घोनी॑ । अथो॒ इति॑ । वि । उ॒च्छा॒त् । उत्ऽत॑रान् । अनु॑ । द्यून् । अ॒जरा॑ । अ॒मृता॑ । च॒र॒ति॒ । स्व॒धाभिः॑ ॥

Mantra without Swara
शश्वत्पुरोषा व्युवास देव्यथो अद्येदं व्यावो मघोनी। अथो व्युच्छादुत्तराँ अनु द्यूनजरामृता चरति स्वधाभि: ॥

शश्वत्। पुरा। उषाः। वि। उवास। देवी। अथो इति। अद्य। इदम्। वि। आवः। मघोनी। अथो इति। वि। उच्छात्। उत्ऽतरान्। अनु। द्यून्। अजरा। अमृता। चरति। स्वधाभिः ॥ १.११३.१३

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे स्त्रीजन ! (पुरा) प्रथम (देवी) अत्यन्त प्रकाशमान (मघोनी) प्रशंसित धन प्राप्ति करनेवाली (अजरा) पूर्ण युवावस्थायुक्त (अमृता) रोगरहित (उषाः) प्रभात वेला के समान (उवास) वास कर और (अथो) इसके अनन्तर जैसे प्रभात वेला (उत्तरान्) आगे आनेवाले (अनु, द्यून्) दिनों के अनुकूल (स्वधाभिः) अपने आप धारण किये हुए पदार्थों के साथ (शश्वत्) निरन्तर (वि, चरति) विचरती और अन्धकार को (वि, उच्छात्) दूर करती तथा (अद्य) वर्त्तमान दिन में (इदम्) इस जगत् की (व्यावः) विविध प्रकार से रक्षा करती है वैसे तू हो ॥ १३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे स्त्रि ! जैसे प्रभात वेला कारण और प्रवाहरूप से नित्य हुई तीनों कालों में प्रकाश करने योग्य पदार्थों का प्रकाश करके वर्त्तमान रहती है, वैसे आत्मपन से नित्यस्वरूप तू तीनों कालों में स्थित सत्य व्यवहारों को विद्या और सुशिक्षा से प्रकाश करके पुत्र, पौत्र ऐश्वर्यादि सौभाग्ययुक्त होके सदा सुखी हो ॥ १३ ॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।