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Rigveda Mandal 1 / Sukta 113 / Mantra 12

191 Sukta
20 Mantra
1/113/12
Devata- उषाः द्वितीयस्यार्द्धर्चस्य रात्रिरपि Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
या॒व॒यद्द्वे॑षा ऋत॒पा ऋ॑ते॒जाः सु॑म्ना॒वरी॑ सू॒नृता॑ ई॒रय॑न्ती। सु॒म॒ङ्ग॒लीर्बिभ्र॑ती दे॒ववी॑तिमि॒हाद्योष॒: श्रेष्ठ॑तमा॒ व्यु॑च्छ ॥

या॒व॒यत्ऽद्वे॑षाः । ऋ॒त॒ऽपाः । ऋ॒ते॒ऽजाः । सु॒म्न॒ऽवरी॑ । सू॒नृताः॑ । ई॒रय॑न्ती । सु॒ऽम॒ङ्ग॒लीः । बिभ्र॑ती । दे॒वऽवी॑तिम् । इ॒ह । अ॒द्य । उ॒षः॒ । श्रेष्ठ॑ऽतमा । वि । उ॒च्छ॒ ॥

Mantra without Swara
यावयद्द्वेषा ऋतपा ऋतेजाः सुम्नावरी सूनृता ईरयन्ती। सुमङ्गलीर्बिभ्रती देववीतिमिहाद्योष: श्रेष्ठतमा व्युच्छ ॥

यावयत्ऽद्वेषाः। ऋतऽपाः। ऋतेऽजाः। सुम्नऽवरी। सूनृताः। ईरयन्ती। सुऽमङ्गलीः। बिभ्रती। देवऽवीतिम्। इह। अद्य। उषः। श्रेष्ठऽतमा। वि। उच्छ ॥ १.११३.१२

Ashtak » 1 Adhyay » 8 Varga » 3 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (उषः) उषा के वर्त्तमान विदुषी स्त्रि ! (यावयद्द्वेषाः) जिसने द्वेषयुक्त कर्म दूर किये (ऋतपाः) सत्य की रक्षक (ऋतेजाः) सत्य व्यवहार में प्रसिद्ध (सुम्नावरी) जिसमें प्रशंसित सुख विद्यमान वा (सुमङ्गलीः) जिसमें सुन्दर मङ्गल होते उन (सूनृताः) वेदादि सत्यशास्त्रों की सिद्धान्तवाणियों को (ईरयन्ती) शीघ्र प्रेरणा करती हुई (श्रेष्ठतमा) अतिशय उत्तम गुण, कर्म और स्वभाव से युक्त (देववीतिम्) विद्वानों की विशेष नीति को (बिभ्रती) धारण करती हुई तूं (इह) यहाँ (अद्य) आज (व्युच्छ) दुःख को दूर कर ॥ १२ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे प्रभात वेला अन्धकार का निवारण, प्रकाश का प्रादुर्भाव करा, धार्मिकों को सुखी और चोरादि को पीड़ित करके सब प्राणियों को आनन्दित करती है, वैसे ही विद्या, धर्म, प्रकाशवती शमादि गुणों से युक्त, विदुषी, उत्तम स्त्री अपने पतियों से सन्तानोत्पत्ति करके अच्छी शिक्षा से अविद्यान्धकार को छुड़ा विद्यारूप सूर्य को प्राप्त करा कुल को सुभूषित करें ॥ १२ ॥
Subject
फिर उषा के प्रसङ्ग से स्त्रीविषय को अगले मन्त्र में कहा है ।