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Rigveda Mandal 1 / Sukta 112 / Mantra 4

191 Sukta
25 Mantra
1/112/4
Devata- आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
याभि॒: परि॑ज्मा॒ तन॑यस्य म॒ज्मना॑ द्विमा॒ता तू॒र्षु त॒रणि॑र्वि॒भूष॑ति। याभि॑स्त्रि॒मन्तु॒रभ॑वद्विचक्ष॒णस्ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

याभिः॑ । परि॑ऽज्मा । तन॑यस्य । म॒ज्मना॑ । द्वि॒इमा॒ता । तू॒र्षु । त॒रणिः॑ । वि॒ऽभूष॑ति । याभिः॑ । त्रि॒ऽमन्तुः॑ । अभ॑वत् । वि॒ऽच॒क्ष॒णः । ताभिः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । ऊ॒तिऽभिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
याभि: परिज्मा तनयस्य मज्मना द्विमाता तूर्षु तरणिर्विभूषति। याभिस्त्रिमन्तुरभवद्विचक्षणस्ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥

याभिः। परिऽज्मा। तनयस्य। मज्मना। द्विऽमाता। तूर्षु। तरणिः। विऽभूषति। याभिः। त्रिऽमन्तुः। अभवत्। विऽचक्षणः। ताभिः। ऊँ इति। सु। ऊतिऽभिः। अश्विना। आ। गतम् ॥ १.११२.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 33 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) विद्या और उपदेश की प्राप्ति करानेहारे विद्वान् लोगो ! (याभिः) जिनसे (द्विमाता) दोनों अग्नि और जल का प्रमाण करनेवाला (तूर्षु) शीघ्र करनेवालों में (तरणिः) उछलता सा अतीव वेगवाला (परिज्मा) सर्वत्र गमन करता वायु (तनयस्य) अपने से उत्पन्न अग्नि के (मज्मना) बल से (सु, विभूषति) अच्छे प्रकार सुशोभित होता (उ) और (याभिः) जिनसे (त्रिमन्तुः) कर्म, उपासना और ज्ञान विद्या को माननेहारा (विचक्षणः) विविध प्रकार से सब विद्याओं को प्रत्यक्ष करानेहारा (अभवत्) होवे (ताभिः) उन (ऊतिभिः) रक्षाओं से सहित सब हम लोगों को विद्या देने के लिये (आ, गतम्) प्राप्त हूजिये ॥ ४ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को योग्य है कि प्राण के समान प्रीति और संन्यासियों के समान उपकार करने से सबके लिये विद्या की उन्नति किया करें ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे दोनों कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।