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Rigveda Mandal 1 / Sukta 112 / Mantra 19

191 Sukta
25 Mantra
1/112/19
Devata- आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
याभि॒: पत्नी॑र्विम॒दाय॑ न्यू॒हथु॒रा घ॑ वा॒ याभि॑ररु॒णीरशि॑क्षतम्। याभि॑: सु॒दास॑ ऊ॒हथु॑: सुदे॒व्यं१॒॑ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

याभिः॑ । पत्नीः॑ । वि॒ऽम॒दाय॑ । नि॒ऽऊ॒हथुः॑ । आ । घ॒ । वा॒ । याभिः॑ । अ॒रु॒णीः । अशि॑क्षतम् । याभिः॑ । सु॒ऽदासे॑ । ऊ॒हथुः॑ । सु॒ऽदे॒व्य॑म् । ताभिः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । ऊ॒तिऽभिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
याभि: पत्नीर्विमदाय न्यूहथुरा घ वा याभिररुणीरशिक्षतम्। याभि: सुदास ऊहथु: सुदेव्यं१ ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥

याभिः। पत्नीः। विऽमदाय। निऽऊहथुः। आ। घ। वा। याभिः। अरुणीः। अशिक्षतम्। याभिः। सुऽदासे। ऊहथुः। सुऽदेव्यम्। ताभिः। ऊँ इति। सु। ऊतिऽभिः। अश्विना। आ। गतम् ॥ १.११२.१९

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 36 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) पढ़ने-पढ़ानेहारे ब्रह्मचारी लोगो ! तुम (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (विमदाय) विविध आनन्द के लिये (पत्नीः) पति के साथ यज्ञसम्बन्ध करनेवाली विदुषी स्त्रियों को (न्यूहथुः) निश्चय से ग्रहण करो, (वा) वा (याभिः) जिन रक्षाओं से (अरुणीः) ब्रह्मचारिणी कन्याओं को (घ) ही (आ, अशिक्षतम्) अच्छे प्रकार शिक्षा करो और (याभिः) जिन रक्षादि क्रियाओं से (सुदासे) अच्छे प्रकार दान करने में (सुदेव्यम्) उत्तम विद्वानों में उत्पन्न हुए विज्ञान को (ऊहथुः) प्राप्त कराओ, (ताभिः) उन रक्षाओं से विद्या (उ) और विनय को (सु, आ, गतम्) अच्छे प्रकार प्राप्त हूजिये ॥ १९ ॥
Essence
सुख पाने की इच्छा करनेवाले पुरुष और स्त्रियों को धर्म से सेवित ब्रह्मचर्य से पूर्ण विद्या और युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी तुल्यता से ही विवाह करना योग्य है अथवा ब्रह्मचर्य ही में ठहर के सर्वदा स्त्री-पुरुषों को अच्छी शिक्षा करना योग्य है क्योंकि तुल्य गुणकर्मस्वभाववाले स्त्री-पुरुषों के विना गृहाश्रम को धारण करके कोई किञ्चित् भी सुख वा उत्तम सन्तान को प्राप्त होने में समर्थ नहीं होते, इससे इसी प्रकार विवाह करना चाहिये ॥ १९ ॥
Subject
अब स्त्री-पुरुष को कैसे और कब विवाह करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।