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Rigveda Mandal 1 / Sukta 112 / Mantra 17

191 Sukta
25 Mantra
1/112/17
Devata- आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
याभि॒: पठ॑र्वा॒ जठ॑रस्य म॒ज्मना॒ग्निर्नादी॑देच्चि॒त इ॒द्धो अज्म॒न्ना। याभि॒: शर्या॑त॒मव॑थो महाध॒ने ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

याभिः॑ । पठ॑र्वा । जठ॑रस्य । म॒ज्मना । अ॒ग्निः । न । अदी॑देत् । चि॒तः । इ॒द्धः । अज्म॑न् । आ । याभिः॑ । शर्या॑तम् । अव॑थः । म॒हा॒ऽध॒ने । ताभिः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । ऊ॒तिऽभिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
याभि: पठर्वा जठरस्य मज्मनाग्निर्नादीदेच्चित इद्धो अज्मन्ना। याभि: शर्यातमवथो महाधने ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥

याभिः। पठर्वा। जठरस्य। मज्मना। अग्निः। न। अदीदेत्। चितः। इद्धः। अज्मन्। आ। याभिः। शर्यातम्। अवथः। महाऽधने। ताभिः। ऊँ इति। सु। ऊतिऽभिः। अश्विना। आ। गतम् ॥ १.११२.१७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 36 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) सभा और सेना के अधीश ! तुम दोनों (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (पठर्वा) पढ़नेवाले विद्यार्थियों को जो प्राप्त होता वा (मज्मना) बल से (जठरस्य) उदर के मध्य (चितः) सञ्चित किये (इद्धः) प्रदीप्त (अग्निः) अग्नि के (न) समान (अज्मन्) जिसमें शत्रुओं को गिराते हैं उस बड़े-बड़े धन की प्राप्ति करानेहारे युद्ध में (आ, अदीदेत्) अच्छे प्रदीप्त होवे, वा (याभिः) जिन रक्षाओं के (शर्य्यातम्) हिंसा करनेहारे को प्राप्त पुरुष की (अवथः) रक्षा करो, (ताभिरु) इन्हीं रक्षाओं से प्रजा सेना की रक्षा के लिये (सु, आ, गतम्) आया-जाया कीजिये ॥ १७ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे कोई शौर्य्यादि गुणों से शोभायमान राजा रक्षणीय की रक्षा करे और मारने योग्यों को मारे और जैसे अग्नि वन का दाह करे वैसे शत्रु की सेना को भस्म करे और शत्रुओं के बड़े-बड़े धनों को प्राप्त कराकर आनन्दित करावे, वैसे ही सभा और सेना के प्रति काम किया करें ॥ १७ ॥
Subject
अब सभापति और सेनापति को कैसा अनुष्ठान करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।