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Rigveda Mandal 1 / Sukta 112 / Mantra 14

191 Sukta
25 Mantra
1/112/14
Devata- आदिमे मन्त्रे प्रथमपादस्य द्यावापृथिव्यौ, द्वितीयस्य अग्निः, शिष्टस्य सूक्तस्याश्विनौ Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
याभि॑र्म॒हाम॑तिथि॒ग्वं क॑शो॒जुवं॒ दिवो॑दासं शम्बर॒हत्य॒ आव॑तम्। याभि॑: पू॒र्भिद्ये॑ त्र॒सद॑स्यु॒माव॑तं॒ ताभि॑रू॒ षु ऊ॒तिभि॑रश्वि॒ना ग॑तम् ॥

याभिः॑ । म॒हाम् । अ॒ति॒थि॒ऽग्वम् । क॒शः॒ऽजुव॑म् । दिवः॑ऽदासम् । श॒म्ब॒र॒ऽहत्ये॑ । आव॑तम् । याभिः॑ । पूः॒ऽभिद्ये॑ । त्र॒सद॑स्युम् । आव॑तम् । ताभिः॑ । ऊँ॒ इति॑ । सु । ऊ॒तिऽभिः॑ । अ॒श्वि॒ना॒ । आ । ग॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
याभिर्महामतिथिग्वं कशोजुवं दिवोदासं शम्बरहत्य आवतम्। याभि: पूर्भिद्ये त्रसदस्युमावतं ताभिरू षु ऊतिभिरश्विना गतम् ॥

याभिः। महाम्। अतिथिऽग्वम्। कशःऽजुवम्। दिवःऽदासम्। शम्बरऽहत्ये। आवतम्। याभिः। पूःऽभिद्ये। त्रसदस्युम्। आवतम्। ताभिः। ऊँ इति। सु। ऊतिऽभिः। अश्विना। आ। गतम् ॥ १.११२.१४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 35 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अश्विना) राजा और प्रजा में शूरवीर पुरुषो ! तुम दोनों (शम्बरहत्ये) सेना वा दूसरे के बल पराक्रम का मारना जिसमें हो उस युद्धादि व्यवहार में (याभिः) जिन (ऊतिभिः) रक्षाओं से (महाम्) बड़े प्रशंसनीय (अतिथिग्वम्) अतिथियों को प्राप्त होने, (कशोजुवम्) जलों को चलाने और (दिवोदासम्) दिव्य विद्यारूप क्रियाओं के देनेवाले सेनापति की (आवतम्) रक्षा करो, वा जिन रक्षाओं से (पूर्भिद्ये) शत्रुओं के नगर विदीर्ण हों जिससे उस संग्राम में (त्रसदस्युम्) डाकुओं से डरे हुए श्रेष्ठ जन की (आवतम्) रक्षा करो, (ताभिः) उन्हीं रक्षाओं से हमारी रक्षा के लिये (सु, आ, गतम्) अच्छे प्रकार आइये ॥ १४ ॥
Essence
प्रजा और सेना के मनुष्यों को योग्य है कि सब विद्या में निपुण धार्मिक पुरुष को सभापति कर उसकी सब प्रकार रक्षा करके सबको भय देनेवाले दुष्ट डांकू को मारके आप सुखों को प्राप्त हों और सबको सुखी करें ॥ १४ ॥
Subject
अब प्रजा सेनाजन और सभाध्यक्ष को परस्पर क्या-क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।