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Rigveda Mandal 1 / Sukta 111 / Mantra 4

191 Sukta
5 Mantra
1/111/4
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
ऋ॒भु॒क्षण॒मिन्द्र॒मा हु॑व ऊ॒तय॑ ऋ॒भून्वाजा॑न्म॒रुत॒: सोम॑पीतये। उ॒भा मि॒त्रावरु॑णा नू॒नम॒श्विना॒ ते नो॑ हिन्वन्तु सा॒तये॑ धि॒ये जि॒षे ॥

ऋ॒भु॒क्षण॑म् । इन्द्र॑म् । आ । हु॒वे॒ । ऊ॒तये॑ । ऋ॒भून् । वाजा॑न् । म॒रुतः॑ । सोम॑ऽपीतये । उ॒भा । मि॒त्रावरू॑णा । नू॒नम् । अ॒श्विना॑ । ते । नः॒ । हि॒न्व॒न्तु॒ । सा॒तये॑ । धि॒ये । जि॒षे ॥

Mantra without Swara
ऋभुक्षणमिन्द्रमा हुव ऊतय ऋभून्वाजान्मरुत: सोमपीतये। उभा मित्रावरुणा नूनमश्विना ते नो हिन्वन्तु सातये धिये जिषे ॥

ऋभुक्षणम्। इन्द्रम्। आ। हुवे। ऊतये। ऋभून्। वाजान्। मरुतः। सोमऽपीतये। उभा। मित्रावरुणा। नूनम्। अश्विना। ते। नः। हिन्वन्तु। सातये। धिये। जिषे ॥ १.१११.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 4

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Meaning
मैं (ऊतये) रक्षा आदि व्यवहार के लिये (ऋभुक्षणम्) जो बुद्धिमानों को वसाता वा समझाता है उस (इन्द्रम्) परमैश्वर्ययुक्त उत्तम बुद्धिमान् को (आहुवे) अच्छी प्रकार स्वीकार करता हूँ। मैं (सोमपीतये) पदार्थों के निकाले हुए रस पिआनेहारे यज्ञ के लिये (वाजान्) जो कि अतीव ज्ञानवान् (मरुतः) और ऋतु-ऋतु में अर्थात् समय-समय पर यज्ञ करने वा करानेहारे (ऋभून्) ऋत्विज् हैं उन बुद्धिमानों को स्वीकार करता हूँ। मैं (उभा) दोनों (मित्रावरुणा) सबके मित्र, सबसे श्रेष्ठ, (अश्विना) समस्त अच्छे-अच्छे गुणों में रहनेहारे, पढ़ाने और पढ़नेहारों को स्वीकार करता हूँ। जो (धिये) उत्तम बुद्धि के पाने के लिये (सातये) वा बांट-चूंट के लिये वा (जिषे) शत्रुओं के जीतने को (नः) हम लोगों के समझाने वा बढ़ाने को समर्थ हैं (ते) विद्वान् जन हम लोगों को (नूनम्) एक निश्चय से (हिन्वन्तु) बढ़ावें और समझावें ॥ ४ ॥
Essence
जो शास्त्र में दक्ष, सत्यवादी, क्रियाओं में अतिचतुर और विद्वानों का सेवन करते हैं, वे अच्छी शिक्षायुक्त उत्तम बुद्धि को प्राप्त हों और शत्रुओं को जीतकर कैसे न उन्नति को प्राप्त हों ॥ ४ ॥
Subject
इनका किसलिये हम सत्कार करें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।

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