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Rigveda Mandal 1 / Sukta 111 / Mantra 2

191 Sukta
5 Mantra
1/111/2
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ नो॑ य॒ज्ञाय॑ तक्षत ऋभु॒मद्वय॒: क्रत्वे॒ दक्षा॑य सुप्र॒जाव॑ती॒मिष॑म्। यथा॒ क्षया॑म॒ सर्व॑वीरया वि॒शा तन्न॒: शर्धा॑य धासथा॒ स्वि॑न्द्रि॒यम् ॥

आ । नः॒ । य॒ज्ञाय॑ । त॒क्ष॒त॒ । ऋ॒भु॒ऽमत् । वयः॑ । ऋत्वे॑ । दक्षा॑य । सु॒ऽप्र॒जाव॑तीम् । इष॑म् । यथा॑ । क्षया॑म । सर्व॑ऽवीरया । वि॒शा । तत् । नः॒ । शर्धा॑य । धा॒स॒थ॒ । सु । इ॒न्द्रि॒यम् ॥

Mantra without Swara
आ नो यज्ञाय तक्षत ऋभुमद्वय: क्रत्वे दक्षाय सुप्रजावतीमिषम्। यथा क्षयाम सर्ववीरया विशा तन्न: शर्धाय धासथा स्विन्द्रियम् ॥

आ। नः। यज्ञाय। तक्षत। ऋभुऽमत्। वयः। क्रत्वे। दक्षाय। सुऽप्रजावतीम्। इषम्। यथा। क्षयाम। सर्वऽवीरया। विशा। तत्। नः। शर्धाय। धासथ। सु। इन्द्रियम् ॥ १.१११.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 32 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे बुद्धिमानो ! तुम (नः) हमारी (यज्ञाय) जिससे एक दूसरे से पदार्थ मिलाया जाता है उस शिल्पक्रिया की सिद्धि के लिये वा (क्रत्वे) उत्तम ज्ञान और न्याय के काम और (दक्षाय) बल के लिये (ऋभुमत्) जिसमें प्रशंसित मेधावी अर्थात् बुद्धिमान् जन विद्यमान हैं उस (वयः) जीवन को तथा (सुप्रजावतीम्) जिसमें अच्छी प्रजा विद्यमान हो अर्थात् प्रजाजन प्रसन्न होते हों (इषम्) उस चाहे हुए अन्न को (आतक्षत) अच्छे प्रकार उत्पन्न करो, (यथा) जैसे हम लोग (सर्ववीरया) समस्त वीरों से युक्त (विशा) प्रजा के साथ (क्षयाम) निवास करें तुम भी प्रजा के साथ निवास करो वा जैसे हम लोग (शर्द्धाय) बल के लिये (तत्) उस (सु, इन्द्रियम्) उत्तम विज्ञान और धन को धारण करें वैसे तुम भी (नः) हमारे बल होने के लिये उत्तम ज्ञान और धन को (धासथ) धारण करो ॥ २ ॥
Essence
इस संसार में विद्वानों के साथ अविद्वान् और अविद्वानों के साथ विद्वान् जन प्रीति से नित्य अपना वर्त्ताव रक्खें। इस काम के विना शिल्पविद्यासिद्धि, उत्तम बुद्धि, बल और श्रेष्ठ प्रजाजन कभी नहीं हो सकते ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।