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Rigveda Mandal 1 / Sukta 110 / Mantra 8

191 Sukta
9 Mantra
1/110/8
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
निश्चर्म॑ण ऋभवो॒ गाम॑पिंशत॒ सं व॒त्सेना॑सृजता मा॒तरं॒ पुन॑:। सौध॑न्वनासः स्वप॒स्यया॑ नरो॒ जिव्री॒ युवा॑ना पि॒तरा॑कृणोतन ॥

निः । चर्म॑णः । ऋ॒भ॒वः॒ । गाम् । अ॒पिं॒श॒त॒ । सम् । व॒त्सेन॑ । अ॒सृ॒ज॒त॒ । मा॒तर॑म् । पुन॒रिति॑ । सौध॑न्वनासः । सु॒ऽअ॒प॒स्यया॑ । नरः॑ । जिव्री॒ इति॑ । युवा॑ना । पि॒तरा॑ । अ॒कृ॒णो॒त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
निश्चर्मण ऋभवो गामपिंशत सं वत्सेनासृजता मातरं पुन:। सौधन्वनासः स्वपस्यया नरो जिव्री युवाना पितराकृणोतन ॥

निः। चर्मणः। ऋभवः। गाम्। अपिंशत। सम्। वत्सेन। असृजत। मातरम्। पुनरिति। सौधन्वनासः। सुऽअपस्यया। नरः। जिव्री इति। युवाना। पितरा। अकृणोतन ॥ १.११०.८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 31 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (ऋभवः) बुद्धिमान् मनुष्यो ! तुम (चर्मणः) चाम से (गाम्) गौ को (निरपिंशत) निरन्तर अवयवी करो अर्थात् उसके चाम आदि को खिलाने-पिलाने से पुष्ट करो (पुनः) फिर (वत्सेन) उसके बछड़े के साथ (मातरम्) उस माता गौ को (समसृजत) युक्त करो। हे (सौधन्वनासः) धनुर्वेदविद्याकुशल (नरः) और व्यवहारों को यथायोग्य वर्त्तानेवाले विद्वानो ! तुम (स्वपस्यया) सुन्दर जिसमें काम बने उस चतुराई से (जिव्री) अच्छे जीवनयुक्त बुड्ढे (पितरा) अपने मा-बाप को (युवाना) युवावस्थावालों के सदृश (अकृणोतन) निरन्तर करो ॥ ८ ॥
Essence
पिछले कहे हुए काम के विना कोई भी राज्य नहीं कर सकते, इससे मनुष्यों को चाहिये कि उन कामों का सदा अनुष्ठान किया करें ॥ ८ ॥
Subject
फिर वे विद्वान् क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।