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Rigveda Mandal 1 / Sukta 110 / Mantra 6

191 Sukta
9 Mantra
1/110/6
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृज्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ म॑नी॒षाम॒न्तरि॑क्षस्य॒ नृभ्य॑: स्रु॒चेव॑ घृ॒तं जु॑हवाम वि॒द्मना॑। त॒र॒णि॒त्वा ये पि॒तुर॑स्य सश्चि॒र ऋ॒भवो॒ वाज॑मरुहन्दि॒वो रज॑: ॥

आ । मा॒नी॒षाम् । अ॒न्तरि॑क्षस्य । नृऽभ्यः॑ । स्रु॒चाऽइ॑व । घृ॒तम् । जु॒ह॒वा॒म॒ । वि॒द्मना॑ । त॒र॒णि॒ऽत्वा । ये । पि॒तुः । अ॒स्य॒ । स॒श्चि॒रे । ऋ॒भवः॑ । वाज॑म् । अ॒रु॒ह॒न् । दि॒वः । रजः॑ ॥

Mantra without Swara
आ मनीषामन्तरिक्षस्य नृभ्य: स्रुचेव घृतं जुहवाम विद्मना। तरणित्वा ये पितुरस्य सश्चिर ऋभवो वाजमरुहन्दिवो रज: ॥

आ। मनीषाम्। अन्तरिक्षस्य। नृऽभ्यः। स्रुचाऽइव। घृतम्। जुहवाम। विद्मना। तरणिऽत्वा। ये। पितुः। अस्य। सश्चिरे। ऋभवः। वाजम्। अरुहन्। दिवः। रजः ॥ १.११०.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 31 Mantra » 1

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(ये) जो (ऋभवः) सूर्य्य की किरणें (तरणित्वा) शीघ्रता से (वाजम्) पृथिवी आदि अन्न पर (अरुहन्) चढ़तीं और (दिवः) प्रकाशयुक्त आकाश के बीच (रजः) लोकसमूह को (सश्चिरे) प्राप्त होती हैं। और (अस्य) इस (अन्तरिक्षस्य) आकाश के बीच वर्त्तमान हुई (नृभ्यः) मनुष्यों के लिये (स्रुचेव) जैसे होम करने के पात्र से घृत को छोड़ें वैसे (घृतम्) जल तथा (पितुः) अन्न को प्राप्त कराती हैं, उनके सकाश से हम लोग (विद्मना) जिससे विद्वान् सत्-असत् का विचार करता है, उस ज्ञान से (मनीषाम्) विचारवाली बुद्धि को (आ, जुहवाम) ग्रहण करें ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे ये सूर्य की किरणें लोक-लोकान्तरों को चढ़कर शीघ्र जल वर्षा और उससे ओषधियों को उत्पन्न कर सब प्राणियों को सुखी करती हैं, वैसे राजादि जन प्रजाओं को सुखी करें ॥ ६ ॥
Subject
अब सूर्य्य की किरणें कैसी हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।