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Rigveda Mandal 1 / Sukta 110 / Mantra 5

191 Sukta
9 Mantra
1/110/5
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
क्षेत्र॑मिव॒ वि म॑मु॒स्तेज॑नेनँ॒ एकं॒ पात्र॑मृ॒भवो॒ जेह॑मानम्। उप॑स्तुता उप॒मं नाध॑माना॒ अम॑र्त्येषु॒ श्रव॑ इ॒च्छमा॑नाः ॥

क्षेत्र॑म्ऽइव । वि । म॒मुः॒ । तेज॑नेनम् । एक॑म् । पात्र॑म् । ऋ॒भवः॑ । जेह॑मानम् । उप॑ऽस्तुताः । उ॒प॒ऽमम् । नाध॑मानाः । अम॑र्त्येषु । श्रवः॑ । इ॒च्छमा॑नाः ॥

Mantra without Swara
क्षेत्रमिव वि ममुस्तेजनेनँ एकं पात्रमृभवो जेहमानम्। उपस्तुता उपमं नाधमाना अमर्त्येषु श्रव इच्छमानाः ॥

क्षेत्रम्ऽइव। वि। ममुः। तेजनेन। एकम्। पात्रम्। ऋभवः। जेहमानम्। उपऽस्तुताः। उपऽमम्। नाधमानाः। अमर्त्येषु। श्रवः। इच्छमानाः ॥ १.११०.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 30 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (उपस्तुताः) तीर आनेवालों से प्रशंसा को प्राप्त हुए (नाधमानाः) और लोगों से अपने प्रयोजन से याचे हुए (अमर्त्येषु) अविनाशी पदार्थों में (श्रवः) अन्न को (इच्छमानाः) चाहते हुए (ऋभवः) बुद्धिमान् जन (तेजनेन) अपनी उत्तेजना से (क्षेत्रमिव) खेत के समान (जेहमानम्) प्रयत्नों को सिद्ध करानेहारे (एकम्) एक (उपमम्) उपमा रूप अर्थात् अति श्रेष्ठ (पात्रम्) ज्ञानों के समूह का (वि, ममुः) विशेष मान करते हैं, वे सुख पाते हैं ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे मनुष्य खेत को जोत, बोय और सम्यक् रक्षा कर उससे अन्न आदि को पाके उसका भोजन कर आनन्दित होते हैं, वैसे वेद में कहे हुए कलाकौशल से प्रशंसित यानों को रचकर उनमें बैठ और उन्हें चला और एक देश से दूसरे देश में जाकर व्यवहार वा राज्य से धन को पाकर सुखी होते हैं ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।