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Rigveda Mandal 1 / Sukta 110 / Mantra 3

191 Sukta
9 Mantra
1/110/3
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
तत्स॑वि॒ता वो॑ऽमृत॒त्वमासु॑व॒दगो॑ह्यं॒ यच्छ्र॒वय॑न्त॒ ऐत॑न। त्यं चि॑च्चम॒समसु॑रस्य॒ भक्ष॑ण॒मेकं॒ सन्त॑मकृणुता॒ चतु॑र्वयम् ॥

तत् । स॒वि॒ता । वः॒ । अ॒मृ॒त॒ऽत्वम् । आ । अ॒सु॒व॒त् । अगो॑ह्यम् । यत् । श्र॒वय॑न्तः । ऐत॑न । त्यम् । चि॒त् । च॒म॒सम् । असु॑रस्य । भक्ष॑णम् । एक॑म् । सन्त॑म् । अ॒कृ॒णु॒त॒ । चतुः॑ऽवयम् ॥

Mantra without Swara
तत्सविता वोऽमृतत्वमासुवदगोह्यं यच्छ्रवयन्त ऐतन। त्यं चिच्चमसमसुरस्य भक्षणमेकं सन्तमकृणुता चतुर्वयम् ॥

तत्। सविता। वः। अमृतऽत्वम्। आ। असुवत्। अगोह्यम्। यत्। श्रवयन्तः। ऐतन। त्यम्। चित्। चमसम्। असुरस्य। भक्षणम्। एकम्। सन्तम्। अकृणुत। चतुःऽवयम् ॥ १.११०.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 30 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे बुद्धिमानो ! तुम जो (सविता) ऐश्वर्य्य का देनेवाला विद्वान् (वः) तुम्हारे लिये (यत्) जिस (अमृतत्वम्) मोक्षभाव के (आ, असुवत्) अच्छे प्रकार ऐश्वर्य्य का योग करे (तत्) उसको (अगोह्यम्) प्रकट (श्रवयन्तः) सुनाते हुए सब विद्याओं को (ऐतन) समझाओ, (असुरस्य) जो प्राणों में रम रहा है, उस मेघ के (चमसम्) जिसमें सब भोजन करते हैं अर्थात् जिससे उत्पन्न हुए अन्न को सब खाते हैं (त्यम्) उस (भक्षणम्) सूर्य के प्रकाश को निगल जाने के (चित्) समान (चतुर्वयम्) जिसमें धर्म, अर्थ, काम, और मोक्ष हैं ऐसे (एकम्) एक (सन्तम्) अपने वर्त्ताव को (अकृणुत) करो ॥ ३ ॥
Essence
हे विद्वानो ! जैसे मेघ प्राण की पुष्टि करनेवाले अन्न आदि पदार्थों को देनेवाला होकर सुखी करता है, वैसे ही आप लोग विद्या के दान करनेवाले होकर विद्यार्थियों को विद्वान् कर सुन्दर उपकार करो ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे कैसे वर्त्तें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।