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Rigveda Mandal 1 / Sukta 110 / Mantra 2

191 Sukta
9 Mantra
1/110/2
Devata- ऋभवः Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराड्जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
आ॒भो॒गयं॒ प्र यदि॒च्छन्त॒ ऐत॒नापा॑का॒: प्राञ्चो॒ मम॒ के चि॑दा॒पय॑:। सौध॑न्वनासश्चरि॒तस्य॑ भू॒मनाग॑च्छत सवि॒तुर्दा॒शुषो॑ गृ॒हम् ॥

आ॒ऽभो॒गय॑म् । प्र । यत् । इ॒च्छन्तः॑ । ऐत॑न । अपा॑काः । प्राञ्चः॑ । मम॑ । के । चि॒त् । आ॒पयः॑ । सौध॑न्वनासः । च॒रि॒तस्य॑ । भू॒मना॑ । अग॑च्छत । स॒वि॒तुः । दा॒शुषः॑ । गृ॒हम् ॥

Mantra without Swara
आभोगयं प्र यदिच्छन्त ऐतनापाका: प्राञ्चो मम के चिदापय:। सौधन्वनासश्चरितस्य भूमनागच्छत सवितुर्दाशुषो गृहम् ॥

आऽभोगयम्। प्र। यत्। इच्छन्तः। ऐतन। अपाकाः। प्राञ्चः। मम। के। चित्। आपयः। सौधन्वनासः। चरितस्य। भूमना। अगच्छत। सवितुः। दाशुषः। गृहम् ॥ १.११०.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 30 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (प्राञ्चः) प्राचीन (अपाकाः) रोटी आदि का स्वयं पाक तथा यज्ञादि कर्म न करनेहारे संन्यासी जनो ! आप जो (के, चित्) कोई जन (मम) मेरे (आपयः) विद्या में अच्छी प्रकार व्याप्त होने की कामना किए (यत्) जिस (आ भोगयम्) अच्छी प्रकार भोगने के पदार्थों में प्रशंसित भोग की (इच्छन्तः) चाह कर रहे हैं, उनको उसी भोग को (प्र, ऐतन) प्राप्त करो। हे (सौधन्वनासः) धनुष बाण के बाँधनेवालों में अतीव चतुरो ! जब तुम (भूमना) बहुत (चरितस्य) किये हुए काम के (सवितुः) ऐश्वर्य से युक्त (दाशुषः) दान करनेवाले के (गृहम्) घर को (आगच्छत) आओ तब जिज्ञासुओं अर्थात् उपदेश सुननेवालों के प्रति सांचे धर्म के ग्रहण करने का उपदेश करो ॥ २ ॥
Essence
हे गृहस्थ आदि मनुष्यो ! तुम संन्यासियों से सत्य विद्या को पाकर, कहीं दान करनेवालों की सभा में जाकर, वहाँ युक्ति से बैठ और निरभिमानता से वर्त्तकर विद्या और विनय का प्रचार करो ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।