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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 8

191 Sukta
8 Mantra
1/11/8
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इन्द्र॒मीशा॑न॒मोज॑सा॒भि स्तोमा॑ अनूषत। स॒हस्रं॒ यस्य॑ रा॒तय॑ उ॒त वा॒ सन्ति॒ भूय॑सीः॥

इन्द्र॑म् । ईशा॑नम् । ओज॑सा । अ॒भि । स्तोमाः॑ । अ॒नू॒ष॒त॒ । स॒हस्र॑म् । यस्य॑ । रा॒तयः॑ । उ॒त । वा॒ । सन्ति॑ । भूय॑सीः ॥

Mantra without Swara
इन्द्रमीशानमोजसाभि स्तोमा अनूषत। सहस्रं यस्य रातय उत वा सन्ति भूयसीः॥

इन्द्रम्। ईशानम्। ओजसा। अभि। स्तोमाः। अनूषत। सहस्रम्। यस्य। रातयः। उत। वा। सन्ति। भूयसीः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 8

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(यस्य) जिस जगदीश्वर के ये सब (स्तोमाः) स्तुतियों के समूह (सहस्रम्) हजारों (उत वा) अथवा (भूयसीः) अधिक (रातयः) दान (सन्ति) हैं, वे उस (ओजसा) अनन्त बल के साथ वर्त्तमान (ईशानम्) कारण से सब जगत् को रचनेवाले तथा (इन्द्रम्) सकल ऐश्वर्य्ययुक्त जगदीश्वर के (अभ्यनूषत) सब प्रकार से गुणकीर्त्तन करते हैं॥८॥
Essence
जिस दयालु ईश्वर ने प्राणियों के सुख के लिये जगत् में अनेक उत्तम-उत्तम पदार्थ अपने पराक्रम से उत्पन्न करके जीवों को दिये हैं, उसी ब्रह्म के स्तुतिविधायक सब धन्यवाद होते हैं, इसलिये सब मनुष्यों को उसी का आश्रय लेना चाहिये॥८॥इस सू्क्त में इन्द्र शब्द से ईश्वर की स्तुति, निर्भयता-सम्पादन, सूर्य्यलोक के कार्य्य, शूरवीर के गुणों का वर्णन, दुष्ट शत्रुओं का निवारण, प्रजा की रक्षा तथा ईश्वर के अनन्त सामर्थ्य से कारण करके जगत् की उत्पत्ति आदि के विधान से इस ग्यारहवें सूक्त की सङ्गति दशवें सूक्त के अर्थ के साथ जाननी चाहिये। यह भी सूक्त सायणाचार्य्य आदि आर्य्यावर्त्तवासी तथा यूरोपदेशवासी विलसन साहब आदि ने विपरीत अर्थ के साथ वर्णन किया है॥
Subject
अगले मन्त्र में ईश्वर के गुणों का उपदेश किया है-