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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/11/7
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
मा॒याभि॑रिन्द्र मा॒यिनं॒ त्वं शुष्ण॒मवा॑तिरः। वि॒दुष्टे॒ तस्य॒ मेधि॑रा॒स्तेषां॒ श्रवां॒स्युत्ति॑र॥

मा॒याभिः॑ । इ॒न्द्र॒ । मा॒यिन॑म् । त्वम् । शुष्ण॑म् । अव॑ । अ॒ति॒रः॒ । वि॒दुः । ते॒ । तस्य॑ । मेधि॑राः । तेषा॑म् । श्रवां॑सि । उत् । ति॒र॒ ॥

Mantra without Swara
मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः। विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर॥

मायाभिः। इन्द्र। मायिनम्। त्वम्। शुष्णम्। अव। अतिरः। विदुः। ते। तस्य। मेधिराः। तेषाम्। श्रवांसि। उत्। तिर॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 7

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1 Bhashyas
Meaning
हे परमैश्वर्य्य को प्राप्त कराने तथा शत्रुओं की निवृत्ति करनेवाले शूरवीर मनुष्य ! (त्वम्) तू उत्तम बुद्धि सेना तथा शरीर के बल से युक्त हो के (मायाभिः) विशेष बुद्धि के व्यवहारों से (शुष्णम्) जो धर्मात्मा सज्जनों का चित्त व्याकुल करने (मायिनम्) दुर्बुद्धि दुःख देनेवाला सब का शत्रु मनुष्य है, उसका (अवातिर) पराजय किया कर, (तस्य) उसके मारने में (मेधिराः) जो शस्त्रों को जानने तथा दुष्टों को मारने में अति निपुण मनुष्य हैं, वे (ते) तेरे संगम से सुखी और अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हों, (तेषाम्) उन धर्मात्मा पुरुषों के सहाय से शत्रुओं के बलों को (उत्तिर) अच्छी प्रकार निवारण कर॥७॥
Essence
बुद्धिमान् मनुष्यों को ईश्वर आज्ञा देता है कि-साम, दाम, दण्ड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रुजनों की निवृत्ति करके विद्या और चक्रवर्त्ति राज्य की यथावत् उन्नति करनी चाहिये। तथा जैसे इस संसार में कपटी, छली और दुष्ट पुरुष वृद्धि को प्राप्त न हों, वैसा उपाय निरन्तर करना चाहिये॥७॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में सूर्य्य के गुणों का उपदेश किया है-