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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/11/6
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
तवा॒हं शू॑र रा॒तिभिः॒ प्रत्या॑यं॒ सिन्धु॑मा॒वद॑न्। उपा॑तिष्ठन्त गिर्वणो वि॒दुष्टे॒ तस्य॑ का॒रवः॑॥

तव॑ । अ॒हम् । शू॒र॒ । रा॒तिऽभिः॑ । प्रति॑ । आ॒य॒म् । सिन्धु॑म् । आ॒ऽवद॑न् । उप॑ । अ॒ति॒ष्ठ॒न्त॒ । गि॒र्व॒णः॒ । वि॒दुः । ते॒ । तस्य॑ । का॒रवः॑ ॥

Mantra without Swara
तवाहं शूर रातिभिः प्रत्यायं सिन्धुमावदन्। उपातिष्ठन्त गिर्वणो विदुष्टे तस्य कारवः॥

तव। अहम्। शूर। रातिऽभिः। प्रति। आयम्। सिन्धुम्। आऽवदन्। उप। अतिष्ठन्त। गिर्वणः। विदुः। ते। तस्य। कारवः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 6

Bhashya

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Meaning
हे (शूर) धार्मिक घोर युद्ध से दुष्टों की निवृत्ति करने तथा विद्या बल पराक्रमवाले वीर पुरुष ! जो (तव) आपके निर्भयता आदि दानों से मैं (सिन्धुम्) समुद्र के समान गम्भीर वा सुख देनेवाले आपको (आवदन्) निरन्तर कहता हुआ (प्रत्यायम्) प्रतीत करके प्राप्त होऊँ। हे (गिर्वणः) मनुष्यों की स्तुतियों से सेवन करने योग्य ! जो (ते) आपके (तस्य) युद्ध राज्य वा शिल्पविद्या के सहायक (कारवः) कारीगर हैं, वे भी आप को शूरवीर (विदुः) जानते तथा (उपातिष्ठन्त) समीपस्थ होकर उत्तम काम करते हैं, वे सब दिन सुखी रहते हैं॥६॥
Essence
इस मन्त्र में लुप्तोपमालङ्कार है। ईश्वर सब मनुष्यों को आज्ञा देता है कि-जैसे मनुष्यों को धार्मिक शूर प्रशंसनीय सभाध्यक्ष वा सेनापति मनुष्यों के अभयदान से निर्भयता को प्राप्त होकर जैसे समुद्र के गुणों को जानते हैं, वैसे ही उक्त पुरुष के आश्रय से अच्छी प्रकार जानकर उनको प्रसिद्ध करना चाहिये तथा दुःखों के निवारण से सब सुखों के लिये परस्पर विचार भी करना चाहिये॥६॥
Subject
अब अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से शूरवीर के गुणों का उपदेश किया है-

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