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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/11/5
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
त्वं व॒लस्य॒ गोम॒तोऽपा॑वरद्रिवो॒ बिल॑म्। त्वां दे॒वा अबि॑भ्युषस्तु॒ज्यमा॑नास आविषुः॥

त्वम् । व॒लस्य॑ । गोऽम॑तः । अप॑ । अ॒वः॒ । अ॒द्रि॒ऽवः॒ । बिल॑म् । त्वाम् । दे॒वाः । अबि॑भ्युषः । तु॒ज्यमा॑नासः । आ॒वि॒षुः॒ ॥

Mantra without Swara
त्वं वलस्य गोमतोऽपावरद्रिवो बिलम्। त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः॥

त्वम्। वलस्य। गोऽमतः। अप। अवः। अद्रिऽवः। बिलम्। त्वाम्। देवाः। अबिभ्युषः। तुज्यमानासः। आविषुः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 5

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Meaning
(अद्रिवः) जिसमें मेघ विद्यमान है, ऐसा जो सूर्य्यलोक है, वह (गोमतः) जिसमें अपने किरण विद्यमान हैं उस (अबिभ्युषः) भयरहित (बलस्य) मेघ के (बिलम्) जलसमूह को (अपावः) अलग-अलग कर देता है, (त्वाम्) इस सूर्य्य को (तुज्यमानासः) अपनी-अपनी कक्षाओं में भ्रमण करते हुए (देवाः) पृथिवी आदिलोक (आविषुः) विशेष करके प्राप्त होते हैं॥५॥
Essence
जैसे सूर्य्यलोक अपनी किरणों से मेघ के कठिन-कठिन बद्दलों को छिन्न-भिन्न करके भूमि पर गिराता हुआ जल की वर्षा करता है, क्योंकि यह मेघ उसकी किरणों में ही स्थित रहता, तथा इसके चारों ओर आकर्षण अर्थात् खींचने के गुणों से पृथिवी आदि लोक अपनी-अपनी कक्षा में उत्तम-उत्तम नियम से घूमते हैं, इसी से समय के विभाग जो उत्तरायण, दक्षिणायन तथा ऋतु, मास, पक्ष, दिन, घड़ी, पल आदि हो जाते हैं, वैसे ही गुणवाला सेनापति होना उचित है॥५॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में सूर्य्य के गुणों का उपदेश किया है-

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