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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 4

191 Sukta
8 Mantra
1/11/4
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पु॒रां भि॒न्दुर्युवा॑ क॒विरमि॑तौजा अजायत। इन्द्रो॒ विश्व॑स्य॒ कर्म॑णो ध॒र्ता व॒ज्री पु॑रुष्टु॒तः॥

पु॒राम् । भि॒न्दुः । युवा॑ । क॒विः । अमि॑तऽओजाः । अ॒जा॒य॒त॒ । इन्द्रः॑ । विश्व॑स्य । कर्म॑णः । ध॒र्ता । व॒ज्री । पु॒रु॒ऽस्तु॒तः ॥

Mantra without Swara
पुरां भिन्दुर्युवा कविरमितौजा अजायत। इन्द्रो विश्वस्य कर्मणो धर्ता वज्री पुरुष्टुतः॥

पुराम्। भिन्दुः। युवा। कविः। अमितऽओजाः। अजायत। इन्द्रः। विश्वस्य। कर्मणः। धर्ता। वज्री। पुरुऽस्तुतः॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जो यह (अमितौजाः) अनन्त बल वा जलवाला (वज्री) जिसके सब पदार्थों को प्राप्त करानेवाले शस्त्रसमूह वा किरण हैं, और (पुराम्) मिले हुए शत्रुओं के नगरों वा पदार्थों का (भिन्दुः) अपने प्रताप वा ताप से नाश वा अलग-अलग करने (युवा) अपने गुणों से पदार्थों का मेल करने वा कराने तथा (कविः) राजनीति विद्या वा दृश्य पदार्थों का अपने किरणों से प्रकाश करनेवाला (पुरुष्टुतः) बहुत विद्वान् वा गुणों से स्तुति करने योग्य (इन्द्रः) सेनापति और सूर्य्यलोक (विश्वस्य) सब जगत् के (कर्मणः) कार्यों को (धर्त्ता) अपने बल और आकर्षण गुण से धारण करनेवाला (अजायत) उत्पन्न होता और हुआ है, वह सदा जगत् के व्यवहारों की सिद्धि का हेतु है॥४॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जैसे ईश्वर का रचा और धारण किया हुआ यह सूर्य्यलोक अपने वज्ररूपी किरणों से सब मूर्तिमान् पदार्थों को अलग-अलग करने तथा बहुत से गुणों का हेतु और अपने आकर्षणरूप गुण से पृथिवी आदि लोकों का धारण करनेवाला है, वैसे ही सेनापति को उचित है कि शत्रुओं के बल का छेदन साम, दाम और दण्ड से शत्रुओं को छिन्न-भिन्न करके बहुत उत्तम गुणों को ग्रहण करता हुआ भूमि में अपने राज्य का पालन करे॥४॥
Subject
फिर अगले मन्त्र में इन्द्र शब्द से सूर्य्य और सेनापति के गुणों का उपदेश किया है-