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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 3

191 Sukta
8 Mantra
1/11/3
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
पू॒र्वीरिन्द्र॑स्य रा॒तयो॒ न वि द॑स्यन्त्यू॒तयः॑। यदी॒ वाज॑स्य॒ गोम॑तः स्तो॒तृभ्यो॒ मंह॑ते म॒घम्॥

पू॒र्वीः । इन्द्र॑स्य । रा॒तयः॑ । न । वि । द॒स्य॒न्ति॒ । ऊ॒तयः॑ । यदि॑ । वाज॑स्य । गोऽम॑तः । स्तो॒तृऽभ्यः॑ । मंह॑ते । म॒घम् ॥

Mantra without Swara
पूर्वीरिन्द्रस्य रातयो न वि दस्यन्त्यूतयः। यदी वाजस्य गोमतः स्तोतृभ्यो मंहते मघम्॥

पूर्वीः। इन्द्रस्य। रातयः। न। वि। दस्यन्ति। ऊतयः। यदि। वाजस्य। गोऽमतः। स्तोतृऽभ्यः। मंहते। मघम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
(यदि) जो परमेश्वर वा सभा और सेना का स्वामी (स्तोतृभ्यः) जो जगदीश्वर वा सृष्टि के गुणों की स्तुति करनेवाले धर्मात्मा विद्वान् मनुष्य हैं, उनके लिये (वाजस्य) जिसमें सब सुख प्राप्त होते हैं, उस व्यवहार, तथा (गोमतः) जिसमें उत्तम पृथिवी, गौ आदि पशु और वाणी आदि इन्द्रियाँ वर्त्तमान हैं, उसके सम्बन्धी (मघम्) विद्या और सुवर्णादि धन को (मंहते) देता है, तो इस (इन्द्रस्य) परमेश्वर तथा सभा सेना के स्वामी की (पूर्व्यः) सनातन प्राचीन (रातयः) दानशक्ति तथा (ऊतयः) रक्षा हैं, वे कभी (न) नहीं (विदस्यन्ति) नाश को प्राप्त होतीं, किन्तु नित्य प्रति वृद्धि ही को प्राप्त होती रहती हैं॥३॥
Essence
इस मन्त्र में भी श्लेषालङ्कार है। जैसे ईश्वर वा राजा की इस संसार में दान और रक्षा निश्चल न्याययुक्त होती हैं, वैसे अन्य मनुष्यों को भी प्रजा के बीच में विद्या और निर्भयता का निरन्तर विस्तार करना चाहिये। जो ईश्वर न होता तो यह जगत् कैसे उत्पन्न होता? तथा जो ईश्वर सब पदार्थों को उत्पन्न करके सब मनुष्यों के लिये नहीं देता तो मनुष्य लोग कैसे जी सकते? इससे सब कार्य्यों का उत्पन्न करने और सब सुखों का देनेवाला ईश्वर ही है, अन्य कोई नहीं, यह बात सब को माननी चाहिये॥३॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में इन्हीं दोनों का उपदेश किया है-