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Rigveda Mandal 1 / Sukta 11 / Mantra 2

191 Sukta
8 Mantra
1/11/2
Devata- इन्द्र: Rishi- जेता माधुच्छ्न्दसः Chhanda- निचृदनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
स॒ख्ये त॑ इन्द्र वा॒जिनो॒ मा भे॑म शवसस्पते। त्वाम॒भि प्रणो॑नुमो॒ जेता॑र॒मप॑राजितम्॥

स॒ख्ये । ते॒ । इ॒न्द्र॒ । वा॒जिनः॑ । मा । भे॒म॒ । श॒व॒सः॒ । प॒ते॒ । त्वाम् । अ॒भि । प्र । नो॒नु॒मः॒ । जेता॑रम् । अप॑राऽजितम् ॥

Mantra without Swara
सख्ये त इन्द्र वाजिनो मा भेम शवसस्पते। त्वामभि प्रणोनुमो जेतारमपराजितम्॥

सख्ये। ते। इन्द्र। वाजिनः। मा। भेम। शवसः। पते। त्वाम्। अभि। प्र। नोनुमः। जेतारम्। अपराऽजितम्॥

Ashtak » 1 Adhyay » 1 Varga » 21 Mantra » 2

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Meaning
हे (शवसः) अनन्तबल वा सेनाबल के (पते) पालन करनेहारे ईश्वर वा अध्यक्ष ! (अभिजेतारम्) प्रत्यक्ष शत्रुओं को जिताने वा जीतनेवाले (अपराजितम्) जिसका पराजय कोई भी न कर सके (त्वा) उस आप को (वाजिनः) उत्तम विद्या वा बल से अपने शरीर के उत्तम बल वा समुदाय को जानते हुए हम लोग (प्रणोनुमः) अच्छी प्रकार आप की वार-वार स्तुति करते हैं, जिससे (इन्द्र) हे सब प्रजा वा सेना के स्वामी ! (ते) आप जगदीश्वर वा सभाध्यक्ष के साथ (सख्ये) हम लोग मित्रभाव करके शत्रुओं वा दुष्टों से कभी (मा भेम) भय न करें॥२॥
Essence
इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। जो मनुष्य परमेश्वर की आज्ञा के पालने वा अपने धर्मानुष्ठान से परमात्मा तथा शूरवीर आदि मनुष्यों में मित्रभाव अर्थात् प्रीति रखते हैं, वे बलवाले होकर किसी मनुष्य से पराजय वा भय को प्राप्त कभी नहीं होते॥२॥
Subject
फिर भी अगले मन्त्र में इन्हीं दोनों का प्रकाश किया है-

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