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Rigveda Mandal 1 / Sukta 109 / Mantra 7

191 Sukta
8 Mantra
1/109/7
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
आ भ॑रतं॒ शिक्ष॑तं वज्रबाहू अ॒स्माँ इ॑न्द्राग्नी अवतं॒ शची॑भिः। इ॒मे नु ते र॒श्मय॒: सूर्य॑स्य॒ येभि॑: सपि॒त्वं पि॒तरो॑ न॒ आस॑न् ॥

आ । भ॒र॒त॒म् । शिक्ष॑तम् । व॒ज्र॒बा॒हू॒ इति॑ वज्रऽबाहू । अ॒स्मान् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ । अ॒व॒त॒म् । शची॑भिः । इ॒मे । नु । ते । र॒श्मयः॑ । सूर्य॑स्य । येभिः॑ । स॒ऽपि॒त्वम् । पि॒तरः॑ । नः॒ । आस॑न् ॥

Mantra without Swara
आ भरतं शिक्षतं वज्रबाहू अस्माँ इन्द्राग्नी अवतं शचीभिः। इमे नु ते रश्मय: सूर्यस्य येभि: सपित्वं पितरो न आसन् ॥

आ। भरतम्। शिक्षतम्। वज्रबाहू इति वज्रऽबाहू। अस्मान्। इन्द्राग्नी। अवतम्। शचीभिः। इमे। नु। ते। रश्मयः। सूर्यस्य। येभिः। सऽपित्वम्। पितरः। नः। आसन् ॥ १.१०९.७

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 29 Mantra » 2

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Meaning
(वज्रबाहू) जिनके वज्र के तुल्य बल और वीर्य हैं वे (इन्द्राग्नी) हे पढ़ने और पढ़ानेवालो ! तुम दोनों जैसे (इमे) ये (सूर्यस्य) सूर्य की (रश्मयः) किरणे हैं और (ते) रक्षा आदि करते हैं और जैसे (पितरः) पितृजन (येभिः) जिन कामों से (नः) हम लोगों के लिये (सपित्वम्) समान व्यवहारों की प्राप्ति करने वा विज्ञान को देकर उपकार के करनेवाले (आसन्) होते हैं वैसे (शचीभिः) अच्छे काम वा उत्तम बुद्धियों से (अस्मान्) हम लोगों को (आ, भरतम्) स्वीकार करो, (शिक्षतम्) शिक्षा देओ और (नु) शीघ्र (अवतम्) पालो ॥ ७ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे मनुष्यो ! जो अच्छी शिक्षा से मनुष्यों में सूर्य के समान विद्या का प्रकाशकर्त्ता और माता-पिता के तुल्य कृपा से रक्षा करने वा पढ़ानेवाला तथा सूर्य के तुल्य प्रकाशित बुद्धि को प्राप्त और दूसरा पढ़नेवाला है, उन दोनों का नित्य सत्कार करो, इस काम के विना कभी विद्या की उन्नति होने का संभव नहीं हैं ॥ ७ ॥
Subject
अब पढ़ाने और पढ़नेवाले कैसे होते हैं, यह उपदेश अगले मन्त्र में इन्द्र और अग्नि नाम से किया है ।

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