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Rigveda Mandal 1 / Sukta 109 / Mantra 6

191 Sukta
8 Mantra
1/109/6
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्र च॑र्ष॒णिभ्य॑: पृतना॒हवे॑षु॒ प्र पृ॑थि॒व्या रि॑रिचाथे दि॒वश्च॑। प्र सिन्धु॑भ्य॒: प्र गि॒रिभ्यो॑ महि॒त्वा प्रेन्द्रा॑ग्नी॒ विश्वा॒ भुव॒नात्य॒न्या ॥

प्र । च॒र्ष॒णिऽभ्यः॑ । पृ॒त॒ना॒ऽहवे॑षु । प्र । पृ॒थि॒व्याः । रि॒रि॒चा॒थे॒ इति॑ । दि॒वः । च॒ । प्र । सिन्धु॑ऽभ्यः । प्र । गि॒रिऽभ्यः॑ । म॒हि॒ऽत्वा । प्र । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । विश्वा॑ । भुव॑ना । अति॑ । अ॒न्या ॥

Mantra without Swara
प्र चर्षणिभ्य: पृतनाहवेषु प्र पृथिव्या रिरिचाथे दिवश्च। प्र सिन्धुभ्य: प्र गिरिभ्यो महित्वा प्रेन्द्राग्नी विश्वा भुवनात्यन्या ॥

प्र। चर्षणिऽभ्यः। पृतनाऽहवेषु। प्र। पृथिव्याः। रिरिचाथे इति। दिवः। च। प्र। सिन्धुऽभ्यः। प्र। गिरिऽभ्यः। महिऽत्वा। प्र। इन्द्राग्नी इति। विश्वा। भुवना। अति। अन्या ॥ १.१०९.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 29 Mantra » 1

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Meaning
(इन्द्राग्नी) वायु और बिजुली (अन्या) (विश्वा) (भुवना) और समस्त लोकों को (महित्वा) प्रशंसित कराके (पृतनाहवेषु) सेनाओं से प्रवृत्त होते हुए युद्धों में (चर्षणिभ्यः) मनुष्यों से (प्र, पृथिव्याः) अच्छे प्रकार पृथिवी वा (प्र, सिन्धुभ्यः) अच्छे प्रकार समुद्रों वा (प्र, गिरिभ्यः) अच्छे प्रकार पर्वतों वा (प्र, दिवश्च) और अच्छे प्रकार सूर्य्य से (प्र, अति, रिरिचाथे) अत्यन्त बढ़कर प्रतीत होते अर्थात् कलायन्त्रों के सहाय से बढ़कर काम देते हैं ॥ ६ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। पवन और बिजुली के समान बड़ा कोई लोक नहीं होने योग्य है क्योंकि ये दोनों सब लोकों को व्याप्त होकर ठहरे हुए हैं ॥ ६ ॥
Subject
अब पवन और बिजुली कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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