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Rigveda Mandal 1 / Sukta 109 / Mantra 5

191 Sukta
8 Mantra
1/109/5
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वामि॑न्द्राग्नी॒ वसु॑नो विभा॒गे त॒वस्त॑मा शुश्रव वृत्र॒हत्ये॑। तावा॒सद्या॑ ब॒र्हिषि॑ य॒ज्ञे अ॒स्मिन्प्र च॑र्षणी मादयेथां सु॒तस्य॑ ॥

यु॒वाम् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । वसु॑नः । वि॒ऽभा॒गे । त॒वःऽत॑मा । शु॒श्र॒व॒ । वृ॒त्र॒ऽहत्ये॑ । तौ । आ॒ऽसद्य॑ । ब॒र्हिषि॑ । य॒ज्ञे । अ॒स्मिन् । प्र । च॒र्ष॒णी॒ इति॑ । मा॒द॒ये॒था॒म् । सु॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
युवामिन्द्राग्नी वसुनो विभागे तवस्तमा शुश्रव वृत्रहत्ये। तावासद्या बर्हिषि यज्ञे अस्मिन्प्र चर्षणी मादयेथां सुतस्य ॥

युवाम्। इन्द्राग्नी इति। वसुनः। विऽभागे। तवःऽतमा। शुश्रव। वृत्रऽहत्ये। तौ। आऽसद्य। बर्हिषि। यज्ञे। अस्मिन्। प्र। चर्षणी इति। मादयेथाम्। सुतस्य ॥ १.१०९.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 28 Mantra » 5

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Meaning
मैं (वसुनः) धन के (विभागे) सेवन व्यवहार में (वृत्रहत्ये) वा जिसमें शत्रुओं और मेघों का हनन हो उस संग्राम में (युवाम्) ये दोनों (इन्द्राग्नी) बिजुली और साधारण अग्नि (तवस्तमा) अतीव बलवान् और बल के देनेहारे हैं यह (शुश्रव) सुनता हूँ, इससे (तौ) वे दोनों (प्रचर्षणी) अच्छे सुख को प्राप्त करानेहारे (अस्मिन्) इस (बर्हिषि) समीप में बढ़नेहारे (यज्ञे) शिल्पव्यवहार के निमित्त (सुतस्य) उत्पन्न किये विमान आदि रथ को (आसद्य) प्राप्त होकर (मादयेथाम्) आनन्द देते हैं ॥ ५ ॥
Essence
मनुष्य जिनसे धनों का विभाग करते हैं वा शत्रुओं को जीतके समस्त पृथिवी पर राज्यकर सकते हैं, उनको कार्य की सिद्धि के लिये कैसे न यथायोग्य कामों में युक्त करें ॥ ५ ॥
Subject
फिर वे दोनों कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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