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Rigveda Mandal 1 / Sukta 109 / Mantra 4

191 Sukta
8 Mantra
1/109/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यु॒वाभ्यां॑ दे॒वी धि॒षणा॒ मदा॒येन्द्रा॑ग्नी॒ सोम॑मुश॒ती सु॑नोति। ताव॑श्विना भद्रहस्ता सुपाणी॒ आ धा॑वतं॒ मधु॑ना पृ॒ङ्क्तम॒प्सु ॥

यु॒वाभ्या॑म् । दे॒वी । धि॒षणा॑ । मदा॑य । इन्द्रा॑ग्नी॒ इति॑ । सोम॑म् । उ॒श॒ती । सु॒नो॒ति॒ । तौ । अ॒श्वि॒ना॒ । भ॒द्र॒ऽह॒स्ता॒ । सु॒पा॒णी॒ इति॑ सुऽपाणी । आ । धा॒व॒त॒म् । मधु॑ना । पृ॒ङ्क्तम् । अ॒प्ऽसु ॥

Mantra without Swara
युवाभ्यां देवी धिषणा मदायेन्द्राग्नी सोममुशती सुनोति। तावश्विना भद्रहस्ता सुपाणी आ धावतं मधुना पृङ्क्तमप्सु ॥

युवाभ्याम्। देवी। धिषणा। मदाय। इन्द्राग्नी इति। सोमम्। उशती। सुनोति। तौ। अश्विना। भद्रऽहस्ता। सुपाणी इति सुऽपाणी। आ। धावतम्। मधुना। पृङ्क्तम्। अप्ऽसु ॥ १.१०९.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 28 Mantra » 4

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जो (सोमम्) ऐश्वर्य्य की (उशती) कान्ति करानेवाली (देवी) अच्छी-अच्छी शिक्षा और शास्त्रविद्या आदि से प्रकाशमान (धिषणा) बुद्धि (मदाय) आनन्द के लिये (युवाभ्याम्) जिनसे कामों को (सुनोति) सिद्ध करती है उस बुद्धि से जो (इन्द्राग्नी) बिजुली और भौतिक अग्नि (अप्सु) कलाघरों के जलके स्थानों में (मधुना) जल से (पृङ्क्तम्) संपर्क अर्थात् संबन्ध करते हैं वा (भद्रहस्ता) जिनके उत्तम सुख के करनेवाले हाथों के तुल्य गुण (सुपाणी) और अच्छे-अच्छे व्यवहार वा (अश्विना) जो सब में व्याप्त होनेवाले हैं (तौ) वे बिजुली और भौतिक अग्नि रथों में अच्छी प्रकार लगाये हुए उनको (आ, धावतम्) चलाते हैं ॥ ४ ॥
Essence
मनुष्य जब-तक अच्छी शिक्षा, उत्तम विद्या और क्रियाकौशलयुक्त बुद्धियों को न सिद्ध करते हैं, तब-तक बिजुली आदि पदार्थों से उपकार को नहीं ले सकते। इससे इस काम को अच्छे यत्न से सिद्ध करना चाहिये ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।