Available Bhashyas

Bhashyas

Choose the bhashyas to show on this mantra page.

Rigveda Mandal 1 / Sukta 109 / Mantra 3

191 Sukta
8 Mantra
1/109/3
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
मा च्छे॑द्म र॒श्मीँरिति॒ नाध॑मानाः पितॄ॒णां श॒क्तीर॑नु॒यच्छ॑मानाः। इ॒न्द्रा॒ग्निभ्यां॒ कं वृष॑णो मदन्ति॒ ता ह्यद्री॑ धि॒षणा॑या उ॒पस्थे॑ ॥

मा । छे॒द्म॒ । र॒श्मीन् । इति॑ । नाध॑मानाः । पि॒तॄ॒णाम् । श॒क्तीः । अ॒नु॒ऽयच्छ॑मानाः । इ॒न्द्रा॒ग्निऽभ्या॑म् । कम् । वृष॑णः । म॒द॒न्ति॒ । ता । हि । अद्री॒ इति॑ । धि॒षणा॑याः । उ॒पऽस्थे॑ ॥

Mantra without Swara
मा च्छेद्म रश्मीँरिति नाधमानाः पितॄणां शक्तीरनुयच्छमानाः। इन्द्राग्निभ्यां कं वृषणो मदन्ति ता ह्यद्री धिषणाया उपस्थे ॥

मा। छेद्म। रश्मीन्। इति। नाधमानाः। पितॄणाम्। शक्तीः। अनुऽयच्छमानाः। इन्द्राग्निऽभ्याम्। कम्। वृषणः। मदन्ति। ता। हि। अद्री इति। धिषणायाः। उपऽस्थे ॥ १.१०९.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 28 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (वृषणः) बलवान् जन जो (अद्री) कभी विनाश को न प्राप्त होनेवाले हैं (ता) उन इन्द्र और अग्नियों को अच्छी प्रकार जान (इन्द्राग्निभ्याम्) इनसे (धिषणायाः) अति विचारयुक्त बुद्धि के (उपस्थे) समीप में स्थिर करने योग्य अर्थात् उस बुद्धि के साथ में लाने योग्य व्यवहार में (कम्) सुख को पाकर (मदन्ति) आनन्दित होते हैं वा उस सुख की चाहना करते हैं वैसे (पितॄणाम्) रक्षा करनेवाले ज्ञानी विद्वानों वा रक्षा से अनुयोग को प्राप्त हुए वसन्त आदि ऋतुओं के (रश्मीन्) विद्यायुक्त ज्ञानप्रकाशों को (नाधमानाः) ऐश्वर्य्य के साथ चाहते (शक्तीः) वा सामर्थ्यों को (अनु, यच्छमानाः) अनुकूलता के साथ नियम में लाते हुए हम लोग आनन्दित होते (हि) ही हैं और (इति) ऐसा जानके इन विद्याओं की जड़ को हम लोग (मा, छेद्म) न काटें ॥ ३ ॥
Essence
ऐश्वर्य्य की कामना करते हुए हम लोगों को कभी विद्वानों का सङ्ग और उनकी सेवा को छोड़ तथा वसन्त आदि ऋतुओं का यथायोग्य अच्छी प्रकार ज्ञान और सेवन का न त्यागकर अपना वर्त्ताव रखना चाहिये और विद्या तथा बुद्धि की उन्नति और व्यवहारसिद्धि उत्तम प्रयत्न के साथ करना चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर उनको क्या न करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।