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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 8

191 Sukta
13 Mantra
1/108/8
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदि॑न्द्राग्नी॒ यदु॑षु तु॒र्वशे॑षु॒ यद्द्रु॒ह्युष्वनु॑षु पू॒रुषु॒ स्थः। अत॒: परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥

यत् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । यदु॑षु । तु॒र्वशे॑षु । यत् । द्रु॒ह्युषु॑ । अनु॑षु । पू॒रुषु॑ । स्थः । अतः॑ । परि॑ । वृ॒ष॒णौ॒ । आ । हि । या॒तम् । अथ॑ । सोम॑स्य । पि॒ब॒त॒म् । सु॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राग्नी यदुषु तुर्वशेषु यद्द्रुह्युष्वनुषु पूरुषु स्थः। अत: परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥

यत्। इन्द्राग्नी इति। यदुषु। तुर्वशेषु। यत्। द्रुह्युषु। अनुषु। पूरुषु। स्थः। अतः। परि। वृषणौ। आ। हि। यातम्। अथ। सोमस्य। पिबतम्। सुतस्य ॥ १.१०८.८

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) स्वामि शिल्पिजनो ! तुम दोनों (यत्) जिस कारण (यदुषु) उत्तम यत्न करनेवाले मनुष्यों में वा (तुर्वषु) जो हिंसक मनुष्यों को वश में करें उनमें वा (यत्) जिस कारण (द्रुह्युषु) द्रोही जनों में वा (अनुषु) प्राण अर्थात् जीवन सुख देनेवालों में तथा (पूरुषु) जो अच्छे गुण, विद्या वा कामों में परिपूर्ण हैं उनमें यथोचित अर्थात् जिससे जैसा चाहिये वैसा वर्तनेवाले (स्थः) हो (अतः) इस कारण से सब मनुष्यों में (वृषणौ) सुखरूपी वर्षा करते हुए (आ, यातम्) अच्छे प्रकार आओ (हि) एक निश्चय के साथ, (अथ) इसके अनन्तर (सुतस्य) निकासे हुए (सोमस्य) जगत् के पदार्थों के रस को (परि, पिबतम्) अच्छी प्रकार पिओ ॥ ८ ॥
Essence
जो न्याय और सेना के अधिकार को प्राप्त हुए मनुष्यों में यथायोग्य वर्त्तमान हैं, सब मनुष्यों को चाहिये कि उनको ही उन कामों में स्थापन अर्थात् मानकर कामों की सिद्धि करें ॥ ८ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।