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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 5

191 Sukta
13 Mantra
1/108/5
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
यानी॑न्द्राग्नी च॒क्रथु॑र्वी॒र्या॑णि॒ यानि॑ रू॒पाण्यु॒त वृष्ण्या॑नि। या वां॑ प्र॒त्नानि॑ स॒ख्या शि॒वानि॒ तेभि॒: सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥

यानि॑ । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । च॒क्रथुः॑ । वी॒र्या॑णि । यानि॑ । रू॒पाणि॑ । उ॒त । वृष्ण्या॑नि । या । वा॒म् । प्र॒त्नानि॑ । स॒ख्या । शि॒वानि॑ । तेभिः॑ । सोम॑स्य । पि॒ब॒त॒म् । सु॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
यानीन्द्राग्नी चक्रथुर्वीर्याणि यानि रूपाण्युत वृष्ण्यानि। या वां प्रत्नानि सख्या शिवानि तेभि: सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥

यानि। इन्द्राग्नी इति। चक्रथुः। वीर्याणि। यानि। रूपाणि। उत। वृष्ण्यानि। या। वाम्। प्रत्नानि। सख्या। शिवानि। तेभिः। सोमस्य। पिबतम्। सुतस्य ॥ १.१०८.५

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 5

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1 Bhashyas
Meaning
हे (इन्द्राग्नी) स्वामि और सेवक (वाम्) तुम्हारे (यानि) जो (वीर्याणि) पराक्रमयुक्त काम (यानि) जो (रूपाणि) शिल्पविद्या से सिद्ध, चित्र, विचित्र, अद्भुत जिनका रूप वे विमान आदि यान और (वृष्ण्यानि) पुरुषार्थयुक्त काम (या) वा जो तुम दोनों के (प्रत्नानि) प्राचीन (शिवानि) मङ्गलयुक्त (सख्या) मित्रों के काम हैं (तेभिः) उनसे (सुतस्य) निकाले हुए (सोमस्य) संसारी वस्तुओं के रस को (पिबतम्) पिओ (उत) और हम लोगों के लिये (चक्रथुः) उनसे सुख करो ॥ ५ ॥
Essence
इस मन्त्र में इन्द्र शब्द से धनाढ्य और अग्नि शब्द से विद्यावान् शिल्पी का ग्रहण किया जाता है, विद्या और पुरुषार्थ के विना कामों की सिद्धि कभी नहीं होती और न मित्रभाव के विना सर्वदा व्यवहार सिद्ध हो सकता है, इससे उक्त काम सर्वदा करने योग्य हैं ॥ ५ ॥
Subject
अब ऐश्वर्य्ययुक्त स्वामी और शिल्पविद्या की क्रियाओं में कुशल शिल्पीजन के कामों को अगले मन्त्र में कहा है ।