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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 4

191 Sukta
13 Mantra
1/108/4
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- भुरिक्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
समि॑द्धेष्व॒ग्निष्वा॑नजा॒ना य॒तस्रु॑चा ब॒र्हिरु॑ तिस्तिरा॒णा। ती॒व्रैः सोमै॒: परि॑षिक्तेभिर॒र्वागेन्द्रा॑ग्नी सौमन॒साय॑ यातम् ॥

सम्ऽइ॑द्धेषु । अ॒ग्निषु॑ । आ॒न॒जा॒ना । य॒तऽस्रु॑चा । ब॒र्हिः । ऊँ॒ इति॑ । ति॒स्ति॒रा॒णा । ती॒व्रैः । सोमैः॑ । परि॑ऽसिक्तेभिः । अ॒र्वाक् । आ । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । सौ॒म॒न॒साय॑ । या॒त॒म् ॥

Mantra without Swara
समिद्धेष्वग्निष्वानजाना यतस्रुचा बर्हिरु तिस्तिराणा। तीव्रैः सोमै: परिषिक्तेभिरर्वागेन्द्राग्नी सौमनसाय यातम् ॥

सम्ऽइद्धेषु। अग्निषु। आनजाना। यतऽस्रुचा। बर्हिः। ऊँ इति। तिस्तिराणा। तीव्रैः। सोमैः। परिऽसिक्तेभिः। अर्वाक्। आ। इन्द्राग्नी इति। सौमनसाय। यातम् ॥ १.१०८.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 4

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Meaning
हे मनुष्यो ! जो तुम (यतस्रुचा) जिनमें स्रुच् अर्थात् होम करने के काम में जो स्रुचा होती हैं, उनके समान कलाघर विद्यमान (तिस्तिराणा) वा जो यन्त्रकलादिकों से ढांपे हुए होते हैं (आनजाना) वे आप प्रसिद्ध और प्रसिद्धि करनेवाले (इन्द्राग्नी) वायु और विद्युत् अर्थात् पवन और बिजुली (तीव्रैः) तीक्ष्ण और वेगादिगुणयुक्त (सोमैः) रसरूप जलों से (परिषिक्तेभिः) सब प्रकार की किई हुई सिचाइयों के सहित (समिद्धेषु) अच्छी प्रकार जलते हुए (अग्निषु) कलाघरों की अग्नियों के होते (अर्वाक्) पीछे (बर्हिः) अन्तरिक्ष में (यातम्) पहुँचाते हैं (उ) और (सौमनसाय) उत्तम से उत्तम सुख के लिये (आ) अच्छे प्रकार आते भी हैं, उनकी अच्छी शिक्षाकर कार्यसिद्धि के लिये कलाओं में लगाने चाहिये ॥ ४ ॥
Essence
जब शिल्पियों से पवन और बिजुली कार्यसिद्धि के अर्थ कलायन्त्रों की क्रियाओं से युक्त किये जाते हैं, तब ये सर्वसुखों के लाभ के लिये समर्थ होते हैं ॥ ४ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।

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