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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 3

191 Sukta
13 Mantra
1/108/3
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
च॒क्राथे॒ हि स॒ध्र्य१॒॑ङ्नाम॑ भ॒द्रं स॑ध्रीची॒ना वृ॑त्रहणा उ॒त स्थ॑:। तावि॑न्द्राग्नी स॒ध्र्य॑ञ्चा नि॒षद्या॒ वृष्ण॒: सोम॑स्य वृष॒णा वृ॑षेथाम् ॥

च॒क्राथे॑ । हि । स॒ध्र्य॑क् । नाम॑ । भ॒द्रम् । स॒ध्री॒ची॒ना । वृ॒त्र॒ऽह॒णौ॒ । उ॒त । स्थः॒ । तौ । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । स॒ध्र्य॑ञ्चा । नि॒ऽसद्य॑ । वृष्णः॑ । सोम॑स्य । वृ॒ष॒णा॒ । आ । वृ॒षे॒था॒म् ॥

Mantra without Swara
चक्राथे हि सध्र्य१ङ्नाम भद्रं सध्रीचीना वृत्रहणा उत स्थ:। ताविन्द्राग्नी सध्र्यञ्चा निषद्या वृष्ण: सोमस्य वृषणा वृषेथाम् ॥

चक्राथे। हि। सध्र्यक्। नाम। भद्रम्। सध्रीचीना। वृत्रऽहणौ। उत। स्थः। तौ। इन्द्राग्नी इति। सध्र्यञ्चा। निऽसद्य। वृष्णः। सोमस्य। वृषणा। आ। वृषेथाम् ॥ १.१०८.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 3

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1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! जो (सध्रीचीना) एक साथ मिलने और (वृत्रहणौ) मेघ के हननेहारे (सध्र्यञ्चा) और एक साथ बड़ाई करने योग्य (निषद्य) नित्य स्थिर होकर (वृष्णः) पुष्टि करते हुए (सोमस्य) रसवान् पदार्थसमूह की (वृषणा) पुष्टि करनेहारे (इन्द्राग्नी) पूर्व कहे हुए अर्थात् पवन और सूर्य्यमण्डल (भद्रम्) वृष्टि आदि काम से परम सुख करनेवाले (सध्र्यक्) एक सङ्ग प्रकट होते हुए (नाम) जल को (चक्राथे) करते हैं (उत) और कार्य्यसिद्धि करनेहारे (स्थः) होते (वृषेथाम्) और सुखरूपी वर्षा करते हैं (तौ) उनको (हि) ही (आ) अच्छी प्रकार जानो ॥ ३ ॥
Essence
मनुष्यों को अत्यन्त उपयोग करनेहारे वायु और सूर्य्यमण्डल को जानके कैसे उपयोग में न लाने चाहिये ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह अगले मन्त्र में उपदेश किया है ।