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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 2

191 Sukta
13 Mantra
1/108/2
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- विराट्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
याव॑दि॒दं भुव॑नं॒ विश्व॒मस्त्यु॑रु॒व्यचा॑ वरि॒मता॑ गभी॒रम्। तावाँ॑ अ॒यं पात॑वे॒ सोमो॑ अ॒स्त्वर॑मिन्द्राग्नी॒ मन॑से यु॒वभ्या॑म् ॥

याव॑त् । इद॒म् । भुव॑नम् । विश्व॑म् । अ॒स्ति॒ । उ॒रु॒ऽव्यचा॑ । व॒रि॒मता॑ । ग॒भी॒रम् । तावा॑न् । अ॒यम् । पात॑वे । सोमः॑ । अ॒स्तु॒ । अर॑म् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । मन॑से । यु॒वऽभ्या॑म् ॥

Mantra without Swara
यावदिदं भुवनं विश्वमस्त्युरुव्यचा वरिमता गभीरम्। तावाँ अयं पातवे सोमो अस्त्वरमिन्द्राग्नी मनसे युवभ्याम् ॥

यावत्। इदम्। भुवनम्। विश्वम्। अस्ति। उरुऽव्यचा। वरिमता। गभीरम्। तावान्। अयम्। पातवे। सोमः। अस्तु। अरम्। इन्द्राग्नी इति। मनसे। युवऽभ्याम् ॥ १.१०८.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 26 Mantra » 2

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
हे मनुष्यो ! तुम (यावत्) जितना (उरुव्यचा) बहुत व्याप्ति अर्थात् पूरेपन और (वरिमता) बहुत स्थूलता के साथ वर्त्तमान (गभीरम्) गहिरा (भुवनम्) सब वस्तुओं के ठहरने का स्थान (इदम्) यह प्रकट अप्रकट (विश्वम्) जगत् (अस्ति) है (तावान्) उतना (अयम्) यह (सोमः) उत्पन्न हुआ पदार्थों का समूह है, उसका (मनसे) विज्ञान कराने को (इन्द्राग्नी) वायु और अग्नि (अरम्) परिपूर्ण हैं, इससे (युवभ्याम्) उन दोनों से (पातवे) रक्षा आदि के लिये उतने बोध और पदार्थ को स्वीकार करो ॥ २ ॥
Essence
विचारशील पुरुषों को यह अवश्य जानना चाहिये कि जहाँ-जहाँ मूर्त्तिमान् लोक हैं, वहाँ-वहाँ पवन और बिजुली अपनी व्याप्ति से वर्त्तमान हैं। जितना मनुष्यों का सामर्थ्य है, उतने तक इनके गुणों को जानकर और पुरुषार्थ से उपयोग लेकर परिपूर्ण सुखी होवें ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।