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Rigveda Mandal 1 / Sukta 108 / Mantra 10

191 Sukta
13 Mantra
1/108/10
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
यदि॑न्द्राग्नी पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्यां म॑ध्य॒मस्या॑मव॒मस्या॑मु॒त स्थः। अत॒: परि॑ वृषणा॒वा हि या॒तमथा॒ सोम॑स्य पिबतं सु॒तस्य॑ ॥

यत् । इ॒न्द्रा॒ग्नी॒ इति॑ । प॒र॒मस्या॑म् । पृ॒थि॒व्याम् । म॒ध्य॒मस्या॑म् । अ॒व॒मस्या॑म् । उ॒त । स्थः । अतः॑ । परि॑ । वृ॒ष॒णौ॒ । आ । हि । या॒तम् । अथ॑ । सोम॑स्य । पि॒ब॒त॒म् । सु॒तस्य॑ ॥

Mantra without Swara
यदिन्द्राग्नी परमस्यां पृथिव्यां मध्यमस्यामवमस्यामुत स्थः। अत: परि वृषणावा हि यातमथा सोमस्य पिबतं सुतस्य ॥

यत्। इन्द्राग्नी इति। परमस्याम्। पृथिव्याम्। मध्यमस्याम्। अवमस्याम्। उत। स्थः। अतः। परि। वृषणौ। आ। हि। यातम्। अथ। सोमस्य। पिबतम्। सुतस्य ॥ १.१०८.१०

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 27 Mantra » 5

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
इस मन्त्र का अर्थ पिछले मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ १० ॥
Essence
इन्द्र और अग्नि दो प्रकार के हैं। एक तो वे कि जो उत्तम गुण, कर्म, स्वभाव में स्थिर वा पवित्र भूमि में स्थिर हैं वे उत्तम और जो अपवित्र गुण, कर्म, स्वभाव में वा अपवित्र भूमि आदि पदार्थों में स्थिर होते हैं वे निकृष्ट, ये दोनों प्रकार के पवन और अग्नि ऊपर-नीचे सर्वत्र चलते हैं। इससे दोनों मन्त्रों से (अवम) और (परम) शब्द जो पहिले प्रयोग किये हुए हैं, उनसे दो प्रकार के (इन्द्र) और (अग्नि) के अर्थ को समझाया है, ऐसा जानना चाहिये ॥ १० ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।