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Rigveda Mandal 1 / Sukta 107 / Mantra 3

191 Sukta
3 Mantra
1/107/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
तन्न॒ इन्द्र॒स्तद्वरु॑ण॒स्तद॒ग्निस्तद॑र्य॒मा तत्स॑वि॒ता चनो॑ धात्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑ति॒: सिन्धु॑: पृथि॒वी उ॒त द्यौः ॥

तत् । नः॒ । इन्द्रः॑ । तत् । वरु॑णः । तत् । अ॒ग्निः । तत् । अ॒र्य॒मा । तत् । स॒वि॒ता । चनः॑ । धा॒त् । तत् । नः॒ । मि॒त्रः । वरु॑णः । म॒म॒ह॒न्ता॒म् । अदि॑तिः । सिन्धुः॑ । पृ॒थि॒वी । उ॒त । द्यौः ॥

Mantra without Swara
तन्न इन्द्रस्तद्वरुणस्तदग्निस्तदर्यमा तत्सविता चनो धात्। तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदिति: सिन्धु: पृथिवी उत द्यौः ॥

तत्। नः। इन्द्रः। तत्। वरुणः। तत्। अग्निः। तत्। अर्यमा। तत्। सविता। चनः। धात्। तत्। नः। मित्रः। वरुणः। ममहन्ताम्। अदितिः। सिन्धुः। पृथिवी। उत। द्यौः ॥ १.१०७.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 25 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
जैसे (मित्रः) मित्रजन (वरुणः) श्रेष्ठ विद्वान् (अदितिः) अखण्डित आकाश (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) भूमि (उत) और (द्यौः) सूर्य आदि का प्रकाश (नः) हमको (मामहन्ताम्) आनन्दित करते हैं (तत्) वैसे (इन्द्रः) बिजुली वा धनाढ्य जन (नः) हमारे लिये (तत्) उस धन वा अन्न को अर्थात् उनके दिये हुए धनादि पदार्थ को (वरुणः) जल वा गुणों से उत्कृष्ट (तत्) उस शरीरसुख को (अग्निः) पावक अग्नि वा न्यायमार्ग में चलानेवाला विद्वान् (तत्) उस आत्मसुख को (अर्यमा) नियमकर्त्ता पवन वा न्यायकर्त्ता सभाध्यक्ष (तत्) इन्द्रियों के सुख को (सविता) सूर्य वा धर्म कार्य्यों में प्रेरणा करनेवाला धर्मज्ञ जन (तत्) उस सामाजिक सुख और (चनः) अन्न को (धात्) धारण करता वा धारण करे ॥ ३ ॥
Essence
जैसे संसारस्थ पृथिवी आदि पदार्थ सुख देनेवाले हैं, वैसे ही विद्वानों को सुख देनेवाले होना चाहिये ॥ ३ ॥इस सूक्त में समस्त विद्वानों के गुणों का वर्णन है। इससे इस सूक्त की पिछले सूक्त के अर्थ के साथ सङ्गति है, यह जानना चाहिये ॥यह १०७ एकसौ सातवाँ सूक्त और २५ पच्चीसवाँ वर्ग समाप्त हुआ ॥
Subject
फिर वे कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।