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Rigveda Mandal 1 / Sukta 106 / Mantra 6

191 Sukta
7 Mantra
1/106/6
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
इन्द्रं॒ कुत्सो॑ वृत्र॒हणं॒ शची॒पतिं॑ का॒टे निवा॑ळ्ह॒ ऋषि॑रह्वदू॒तये॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

इन्द्र॑म् । कुत्सः॑ । वृ॒त्र॒ऽहन॑म् । श॒ची॒ऽपति॑म् । का॒टे । निऽबा॑ळ्हः । ऋषिः॑ । अ॒ह्व॒त् । ऊ॒तये॑ । रथ॑म् । न । दुः॒ऽगात् । व॒स॒वः॒ । सु॒ऽदा॒नवः॒ । विश्व॑स्मात् । नः॒ । अंह॑सः । निः । पि॒प॒र्त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
इन्द्रं कुत्सो वृत्रहणं शचीपतिं काटे निवाळ्ह ऋषिरह्वदूतये। रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन ॥

इन्द्रम्। कुत्सः। वृत्रऽहनम्। शची३ऽपतिम्। काटे। निऽवाळ्हः। ऋषिः। अह्वत्। ऊतये। रथम्। न। दुःऽगात्। वसवः। सुऽदानवः। विश्वस्मात्। नः। अंहसः। निः। पिपर्तन ॥ १.१०६.६

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 6

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1 Bhashyas
Meaning
(कुत्सः) विद्यारूपी वज्र लिये वा पदार्थों को छिन्न-भिन्न करने (निवाढः) निरन्तर सुखों को प्राप्त करानेवाला (ऋषिः) गुरु और विद्यार्थी (काटे) जिसमें समस्त विद्याओं की वर्षा होती है उस अध्यापन व्यवहार में (ऊतये) रक्षा आदि के लिए जिस (वृत्रहणम्) शत्रुओं को विनाश करने वा (शचीपतिम्) वेद वाणी के पालनेहारे (इन्द्रम्) परमैश्वर्य्यवान् शाला आदि के अधीश को (अह्वत्) बुलावे, हम लोग भी उसी को बुलावें। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ ६ ॥
Essence
विद्यार्थी को कपटी पढ़ानेवाले के समीप ठहरना नहीं चाहिये किन्तु आप्त विद्वानों के समीप ठहर और विद्वान् होकर ऋषिजनों के स्वभाव से युक्त होना चाहिये और अपने आत्मा की रक्षा के लिये अधर्म से डरकर धर्म में सदा रहना चाहिये ॥ ६ ॥
Subject
फिर पढ़ाने और पढ़नेवाले क्या करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।