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Rigveda Mandal 1 / Sukta 106 / Mantra 4

191 Sukta
7 Mantra
1/106/4
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
नरा॒शंसं॑ वा॒जिनं॑ वा॒जय॑न्नि॒ह क्ष॒यद्वी॑रं पू॒षणं॑ सु॒म्नैरी॑महे। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

नरा॒शंस॑म् । वा॒जिन॑म् । वा॒जय॑न् । इ॒ह । क्ष॒यत्ऽवी॑रम् । पू॒षण॑म् । सु॒म्नैः । ई॒म॒हे॒ । रथ॑म् । न । दुः॒ऽगात् । व॒स॒वः॒ । सु॒ऽदा॒नवः॒ । विश्व॑स्मात् । नः॒ । अंह॑सः । निः । पि॒प॒र्त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
नराशंसं वाजिनं वाजयन्निह क्षयद्वीरं पूषणं सुम्नैरीमहे। रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन ॥

नराशंसम्। वाजिनम्। वाजयन्। इह। क्षयत्ऽवीरम्। पूषणम्। सुम्नैः। ईमहे। रथम्। न। दुःऽगात्। वसवः। सुऽदानवः। विश्वस्मात्। नः। अंहसः। निः। पिपर्तन ॥ १.१०६.४

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
हे विद्वान् ! जैसे (वाजयन्) उत्तमोत्तम पदार्थों के विशेष ज्ञान कराने वा युद्ध करानेहारे हम लोग (इह) इस सृष्टि में (सुम्नैः) सुखों से युक्त (नराशंसम्) मनुष्यों के प्रार्थना कराने योग्य विद्वान् को तथा (वाजिनम्) विशेष ज्ञान और युद्धविद्या में कुशल (क्षयद्वीरम्) जिसके शत्रुओं को काट करनेहारे वीर और जो (पूषणम्) शरीर वा आत्मा की पुष्टि करानेहारा है, उस सभाध्यक्ष को (ईमहे) प्राप्त होवें वैसे तू शुभगुणों की याचना कर। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के तुल्य जानना चाहिये ॥ ४ ॥
Essence
हम लोग शुभ गुणों से युक्त सुखी मनुष्यों को मित्रता को प्राप्त होकर श्रेष्ठ यानयुक्त हुए शिल्पियों के समान दुःख से पार हों ॥ ४ ॥
Subject
फिर उन कैसों को उपयोग में लावें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।