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Rigveda Mandal 1 / Sukta 106 / Mantra 3

191 Sukta
7 Mantra
1/106/3
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
अव॑न्तु नः पि॒तर॑: सुप्रवाच॒ना उ॒त दे॒वी दे॒वपु॑त्रे ऋता॒वृधा॑। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

अव॑न्तु । नः॒ । पि॒तरः॑ । सु॒ऽप्र॒वा॒च॒नाः । उ॒त । दे॒वी इति॑ । दे॒वपु॑त्रे॒ इति॑ दे॒वऽपु॑त्रे । ऋत॒ऽवृधा॑ । रथ॑म् । न । दुः॒ऽगात् । व॒स॒वः॒ । सु॒ऽदा॒नवः॒ । विश्व॑स्मात् । नः॒ । अंह॑सः । निः । पि॒प॒र्त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
अवन्तु नः पितर: सुप्रवाचना उत देवी देवपुत्रे ऋतावृधा। रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन ॥

अवन्तु। नः। पितरः। सुऽप्रवाचनाः। उत। देवी इति। देवपुत्रे इति देवऽपुत्रे। ऋतऽवृधा। रथम्। न। दुःऽगात्। वसवः। सुऽदानवः। विश्वस्मात्। नः। अंहसः। निः। पिपर्तन ॥ १.१०६.३

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 3

Available Bhashyas

1 Bhashyas
Meaning
(देवपुत्रे) जिनके दिव्यगुण अर्थात् अच्छे-अच्छे विद्वान् जन वा अच्छे रत्नों से युक्त पर्वत आदि पदार्थ पालनेवाले हैं वा जो (ऋतावृधा) सत्य कारण से बढ़ते हैं वे (देवी) अच्छे गुणोंवाले भूमि और सूर्य्य का प्रकाश जैसे (नः) हम लोगों की रक्षा करते हैं, वैसे ही (सुप्रवाचनाः) जिनका अच्छा पढ़ाना और उपदेश है, वे (पितरः) विशेष ज्ञानवाले मनुष्य हम लोगों को (उत) निश्चय से (अवन्तु) रक्षादि व्यवहारों से पालें। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्रार्थ के तुल्य समझना चाहिये ॥ ३ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे दिव्य औषधियों और प्रकाश आदि गुणों से भूमि और सूर्य्यमण्डल सबको सुख के साथ बढ़ाते हैं, वैसे ही आप्त विद्वान् जन सब मनुष्यों को अच्छी शिक्षा और पढ़ाने से विद्या आदि अच्छे गुणों में उन्नति देकर सुखी करते हैं। और जैसे उत्तम रथ आदि पर बैठ के दुःख से जाने योग्य मार्ग के पार सुखपूर्वक जाकर समग्र क्लेश से छूटके सुखी होते हैं, वैसे ही वे उक्त विद्वान् दुष्ट गुण, कर्म और स्वभाव से अलगकर हम लोगों को धर्म के आचरण में उन्नति देवें ॥ ३ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।