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Rigveda Mandal 1 / Sukta 106 / Mantra 2

191 Sukta
7 Mantra
1/106/2
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- कुत्स आङ्गिरसः Chhanda- जगती Swara- निषादः
Mantra with Swara
त आ॑दित्या॒ आ ग॑ता स॒र्वता॑तये भू॒त दे॑वा वृत्र॒तूर्ये॑षु श॒म्भुव॑:। रथं॒ न दु॒र्गाद्व॑सवः सुदानवो॒ विश्व॑स्मान्नो॒ अंह॑सो॒ निष्पि॑पर्तन ॥

ते । आ॒दि॒त्याः॒ । आ । ग॒त॒ । स॒र्वऽता॑तये । भू॒त । दे॒वाः॒ । वृ॒त्र॒ऽतूर्ये॑षु । श॒म्ऽभुवः॑ । रथ॑म् । न । दुः॒ऽगात् । व॒स॒वः॒ । सु॒ऽदा॒नवः॒ । विश्व॑स्मात् । नः॒ । अंह॑सः । निः । पि॒प॒र्त॒न॒ ॥

Mantra without Swara
त आदित्या आ गता सर्वतातये भूत देवा वृत्रतूर्येषु शम्भुव:। रथं न दुर्गाद्वसवः सुदानवो विश्वस्मान्नो अंहसो निष्पिपर्तन ॥

ते। आदित्याः। आ। गत। सर्वऽतातये। भूत। देवाः। वृत्रऽतूर्येषु। शम्ऽभुवः। रथम्। न। दुःऽगात्। वसवः। सुऽदानवः। विश्वस्मात्। नः। अंहसः। निः। पिपर्तन ॥ १.१०६.२

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 24 Mantra » 2

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1 Bhashyas
Meaning
हे (देवाः) दिव्यगुणवाले विद्वान् जनो ! जैसे (आदित्याः) कारणरूप से नित्य दिव्यगुणवाले जो सूर्य्य आदि पदार्थ हैं (ते) वे (वृत्रतूर्य्येषु) मेघावयवों अर्थात् बद्दलों का हिंसन विनाश करना जिनमें होता है, उन संग्रामों में (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले होते हैं, वैसे ही आप लोग हमारे समीप को (आ, गत) आओ और आकर शत्रुओं का हिंसन जिनमें हो, उन संग्रामों में (सर्वतातये) समस्त सुख के लिये (शंभुवः) सुख की भावना करानेवाले (भूत) होओ। शेष मन्त्रार्थ प्रथम मन्त्र के समान जानना चाहिये ॥ २ ॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे ईश्वर के बनाये हुए पृथिवी आदि पदार्थ सब प्राणियों के उपकार के लिये हैं, वैसे ही सबके उपकार के लिये विद्वानों को नित्य अपना वर्त्ताव रखना चाहिये। जैसे अच्छे दृढ़ विमान आदि यान पर बैठ देश-देशान्तर की जा-आकर व्यापार वा विजय से धन और प्रतिष्ठा को प्राप्त हो दरिद्रता और अयश से छूटकर सुखी होते हैं, वैसे ही विद्वान् जन अपने उपदेश से विद्या को प्राप्त कराकर सबको सुखी करें ॥ २ ॥
Subject
फिर वे कैसे हैं, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है ।