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Rigveda Mandal 1 / Sukta 105 / Mantra 9

191 Sukta
19 Mantra
1/105/9
Devata- विश्वेदेवा: Rishi- आप्त्यस्त्रित आङ्गिरसः कुत्सो वा Chhanda- विराट्पङ्क्ति Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
अ॒मी ये स॒प्त र॒श्मय॒स्तत्रा॑ मे॒ नाभि॒रात॑ता। त्रि॒तस्तद्वे॑दा॒प्त्यः स जा॑मि॒त्वाय॑ रेभति वि॒त्तं मे॑ अ॒स्य रो॑दसी ॥

अ॒मी इति॑ । ये । स॒प्त । र॒श्मयः॑ । तत्र॑ । मे॒ । नाभिः॑ । आऽत॑ता । त्रि॒तः । तत् । वे॒द॒ । आ॒प्त्यः । सः । जा॒मि॒ऽत्वाय॑ । रे॒भ॒ति॒ । वि॒त्तम् । मे॒ । अ॒स्य । रो॒द॒सी॒ इति॑ ॥

Mantra without Swara
अमी ये सप्त रश्मयस्तत्रा मे नाभिरातता। त्रितस्तद्वेदाप्त्यः स जामित्वाय रेभति वित्तं मे अस्य रोदसी ॥

अमी इति। ये। सप्त। रश्मयः। तत्र। मे। नाभिः। आऽतता। त्रितः। तत्। वेद। आप्त्यः। सः। जामिऽत्वाय। रेभति। वित्तम्। मे। अस्य। रोदसी इति ॥ १.१०५.९

Ashtak » 1 Adhyay » 7 Varga » 21 Mantra » 4

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1 Bhashyas
Meaning
जहाँ (अमी) (ये) ये (सप्त) सात (रश्मयः) किरणों के समान नीतिप्रकाश हैं (तत्र) वहाँ (मे) मेरी (नाभिः) सब नसों को बाँधनेवाली तोंद (आतता) फैली है, जिसमें निरन्तर मेरी स्थिति है (तत्) उसको जो (आप्त्यः) सज्जनों में उत्तम जन (त्रितः) तीनों अर्थात् भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान काल से (वेद) जाने अर्थात् रात-दिन विचारे (सः) वह पुरुष (जामित्वाय) राज्य भोजने के लिये कन्या के तुल्य (रेभति) प्रजाजनों की रक्षा तथा प्रशंसा और चाहना करता है। और अर्थ प्रथम मन्त्रार्थ के समान जानो ॥ ९ ॥
Essence
जैसे सूर्य्य के साथ किरणों की शोभा और सङ्ग है, वैसे राजपुरुषों के साथ प्रजाजनों की शोभा और सङ्ग हो। तथा जो मनुष्य कर्म, उपासना और ज्ञान को यथावत् जानता है, वह प्रजा के पालने में पितृवत् होकर समस्त प्रजाजनों का मनोरञ्जन कर सकता है, और नहीं ॥ ९ ॥
Subject
अब न्यायाधीशों के साथ प्रजाजन कैसे वर्त्तें, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है ।